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नदी सी मैं ...

Posted On: 14 Apr, 2012 में

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जिंदगी के चंद टुकड़े
यूँही
बिखरने दिया
कभी यूँही
उड़ने दिया
संभाल कर जब कभी
रखना चाहा
समय ने ना रहने दिया
नदी सी मैं
बहती रही
कभी मचलती रही
कभी उफनती रही
तोड़ किनारा
जब भी बहना चाहा
बांधो( बन्धनों) से और भी
जकड़ा पाया
गंदे नाले हों
या शीतल धारा
जो भी मिला
अपना बना डाला
जिंदगी
कभी नदी सी
कभी टुकड़ो सी
जैसे भी पाया
बस जी डाला

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52 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alka के द्वारा
29/10/2012

गंदे नाले हो या शीतल धारा जो भी मिला अपना बना डाला …… महिमा जी क्या खूब कहा आपने सच ही तो है | ये खूबी इश्वर ने हमें उपहार स्वरुप दी है . सुन्दर रचना के लिए बधाई ..

Madan Mohan saxena के द्वारा
18/10/2012

बहुत सराहनीय प्रस्तुति. बहुत सुंदर बात कही है इन पंक्तियों में. दिल को छू गयी. आभार !

jai... के द्वारा
16/10/2012

सुन्दर रचना………….

gopalkdas के द्वारा
23/04/2012

”जिंदगी कभी नदी सी कभी टुकड़ो सी जैसे भी पाया बस जी डाला” वह, अत्यंत सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    23/04/2012

    गोपाल जी नमस्कार , आपको कविता पसंद आई आभारी हूँ , धन्यवाद

sanjay dixit के द्वारा
22/04/2012

ओह ,बहुत व गहन भाव महिमा जी ,भावनाओ की नदी सी बह गई मन में ,बहुत अच्छा लगा

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    22/04/2012

    संजय जी नमस्कार , आपको अच्छी लगी , मुझे बेहद ख़ुशी हुयी …लिखना सार्थक हुआ …हार्दिक आभार

follyofawiseman के द्वारा
21/04/2012

अरे इतनी मेहनत करने की क्या ज़रूरत, पाल को खोल देना था……खैर, अब ऐसा कीजिए नदी ही हो जाइए…..फिर बहते रहने का अफसोस नहीं होगा….. ये कविता महकाव्य हो सकती थी अगर आपने ये सब कुछ प्रफुल्लित हो कर गया होता…….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    22/04/2012

    प्रिय संदीप जी ..सही कहा पर थोड़ी होसलो की कमी थी…..रही महाकाव्य लिखने की ..भविष्य में काम हो जायेगा अनिल जी ने भी और विस्तार देने के लिए परामर्श दिया है ..किसी दिन मूड बनेगा तो करुँगी……धन्यवाद

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
19/04/2012

नदी सी मैं बहती रही कभी मचलती रही कभी उफनती रही तोड़ किनारा जब भी बहना चाहा बांधो( बन्धनों) से और भी जकड़ा पाया गंदे नाले हों या शीतल धारा जो भी मिला अपना बना डाला महिमा जी खूबसूरत …जीना इसी का नाम है ..जिन्दगी यही हो है …चलते रहो बहते झरने सा नदिया सा आगे सागर में विलीन होने तक …जो भी जैसा भी मिले जी लो ………….. भ्रमर ५

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    20/04/2012

    भ्रमर सर , नमस्कार , शुक्र है आप spam से बाहर आ गए ……(mjaak kar rahi hun ) सर आपकी बहुत आभारी हूँ सही कहा है आपने जिन्दी इसी का नाम है ..हार्दिक धन्यवाद

sadhna के द्वारा
19/04/2012

बहुत खूब महिमा जी…. अगर गहराई से सोचा जाए तो हम सब(especially girls) की ज़िन्दगी एक नदी की तरह ही है….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    19/04/2012

    साधना जी स्वागत है आपका बिलकुल सही कहा आपने .. .धन्यवाद आपका

MAHIMA SHREE के द्वारा
19/04/2012

गौरव जी नमस्कार , स्वागत है आपका , , आपने सराहा लिखना सफल हुआ , धन्यवाद

कुमार गौरव के द्वारा
18/04/2012

वाह महिमा जी क्या खूब बातें कहीं आपने इस नदी सी बहती रचना में. बधाई.

yogi sarswat के द्वारा
18/04/2012

जिंदगी कभी नदी सी कभी टुकड़ो सी जैसे भी पाया बस जी डाला बहुत खूब तुलना महिमा श्री जी ! बढ़िया लेखन !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/04/2012

    aadarniy yogi ji dhanywaad aapka

nishamittal के द्वारा
17/04/2012

जीवन चलने का नाम ,चलते रहो गीत को सार्थक करती आपकी रचना पर बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    17/04/2012

    आदरणीया निशा जी , सादर नमस्कार , आपका ह्रदय से आभार

ANAND PRAVIN के द्वारा
16/04/2012

महिमा जी, नमस्कार जीवन चलने का नाम है……….नदी से अच्छा और क्या उदहारण हो सकता है………… सच ही लिखा है आपने ……………..हमें तो बस बहते जाना होता है……चाहे मार्ग में जो भी आये……….सुन्दर कविता पर बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    17/04/2012

    आनंद जी नमस्कार , आपको कविता पसंद आई , आपका बहुत-२ धन्यवाद

Jayprakash Mishra के द्वारा
16/04/2012

संभाल कर जब कभी रखना चाहा समय ने ना रहने दिया नदी सी मैं बहती रही कभी मचलती रही कभी उफनती रही तोड़ किनारा जब भी बहना चाहा बांधो( बन्धनों) से और भी जकड़ा पाया गंदे नाले हों या शीतल धारा जो भी मिला अपना बना डाला महिमा जी, सपने और मजबूरियां मिलकर किसी कविता या गजल को जन्म देते हैं, बहुत खूब

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/04/2012

    जयप्रकाश जी, स्वागत है आपका , आपने पढ़ा और अपने विचार दिए आपका बहुत-२ धन्यवाद

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
16/04/2012

महिमा श्री जी, नमस्कार- सुन्दर व भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिये. मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे भी सहयोग प्रदान कीजिये. http://www.hnif.jagranjunction.com

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/04/2012

    हनीफ जी नमस्कार , स्वागत है आपका , समय दे कर पढने और सराहना के लिए आपका बहुत-२ शुक्रिया जरुर आपके ब्लॉग पे आयुंगी और सहयोग भी दूंगी…

minujha के द्वारा
16/04/2012

महिमा जी आपकी रचना पहले भी पढी है मैनें,आपके भाव गहरे होते है ये आपका बहुत मजबूत पक्ष है ये कविता भी उस मापदंड पर खरी उतरती है शुभकामनाओं सहित

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/04/2012

    आदरणीया मीनू दी , नमस्कार , बड़े दिनों बाद आप दिखी , लगता है व्यस्त थी , आपके विचार दिल को छु गए और उत्साह भी बढ़ा , आपका ह्रदय से आभारी हूँ , स्नेह बनाए रखे , आपका धन्यवाद

akraktale के द्वारा
15/04/2012

महिमा जी सादर नमस्कार, बस यही कह सकता हूँ जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबहो शाम……….. सुन्दर मनोभिव्यक्ति. बधाई.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    आदरणीय अशोक सर , नमस्कार , सर आपसे उमीद करती हूँ खुल कर अच्छा बुरा बताएं .. सकरात्मक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

चन्दन राय के द्वारा
15/04/2012

महिमा जी, नमस्कार. chaliy shukra hai ki aap nadi si bahti rahi varna ruke paani me to kaai jam jati hai , majak kar raha hun sunder kavita

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    चन्दन जी नमस्कार , मजाक में ही सही पर आपने पते की बात कही है… :) सकरात्मक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
15/04/2012

जिन्दा हैं इस तरह से की जिंदगी नहीं जलता हुआ दिया हैं मगर रौशनी नहीं स्नेही महिमा , सादर बहुत सुन्दर भाव , प्रस्तुतीकरण. बधाई.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    आदरणीय सर , सदर चरण स्पर्श जिन्दा हैं इस तरह से की जिंदगी नहीं जलता हुआ दिया हैं मगर रौशनी नहीं क्या बात है…. इन दोनों पंक्तिया में आप ने बहुत कुछ कह दिया… आपका कोटिश धन्यवाद

ajaydubeydeoria के द्वारा
15/04/2012

महिमा जी, नमस्कार. “जिंदगी के चंद टुकड़े यूँही बिखरने दिया कभी यूँही उड़ने दिया संभाल कर जब कभी रखना चाहा समय ने ना रहने दिया” सुन्दर….भाव-पूर्ण अभिव्यक्ति….. बधाई………….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    अजय जी नमस्कार उत्साहवर्धन के लिए आपका कोटिश धन्यवाद

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
15/04/2012

बहुत सुन्दर कविता,महिमा जी. नदी सी मैं बहती रही कभी मचलती रही कभी उफनती रही तोड़ किनारा जब भी बहना चाहा बांधो( बन्धनों) से और भी जकड़ा पाया बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    आदरणीय राजीव सर , सादर नमस्कार , आप हमेशा मेरा उत्साहवर्धन करते रहे यही कामना है सादर धन्यवाद

pawansrivastava के द्वारा
15/04/2012

आखिर चाँद ने बादलों का हिजाब उठा हीं दिया ….प्यारी कविता महिमा जी

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    पवन जी नमस्कार , धन्यवाद बड़े दिन बाद आपके दर्शन हुए ..

dineshaastik के द्वारा
15/04/2012

महिमा जी बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण  अभिव्यक्ति….

dineshaastik के द्वारा
15/04/2012

वाह सरिता जी आपकी भी महिमा अपार है, सरिता की तरह शब्दों का भंडार है, शब्दों की, भावों की, विचारों की, एवं ज्ञान की आपमें बहुत तेज  धार है।

    vikramjitsingh के द्वारा
    15/04/2012

    दिनेश जी, सादर, माफ़ करना प्रभु, यहाँ ‘उफनती नदी’ की बात हो रही है, ‘सरिता’ तो बहुत शांत और शालीन होती है…… बहुत सुन्दर भावपूर्ण कविता है, महिमा जी…

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    आदरणीय दिनेश सर , नमस्कार आपने भी क्या खूब कही :) वाह वाह सर कुछ ज्यादा हो गया लगता है इतनी भी मेरी कविता अच्छी नहीं .. धन्यवाद आपका

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    आदरणीय विक्रम सर , आपने सही कहा सरिता शांत होती है पर बाढ़ आने पे तूफ़ान भी आता है…. आपके सराहना के लिए बहुत -२ धन्यवाद

sinsera के द्वारा
14/04/2012

वाह भाई….सरिता(नदी )की महिमा(महत्व )

    15/04/2012

    सरिता दीदी आपको तो बस मौका चाहिए अपनी झूठी तारीफ़ के लिए……हाँ…हाँ…हाँ…… मित्र बहुत ही सुन्दर भाव. शुरू कि पंक्तियों का जवाब नहीं…. मित्र अपना मेल चेक कर लेना…

    jlsingh के द्वारा
    15/04/2012

    ‘सरिता’ दीदी अगर ‘बादल’ बन जाय तो प्रकृति की ‘महिमा’ से नदी में फिर से उफान आयेगा ही और सरिता दीदी उसी में अपने को ढूंढेगी! दीदी को प्रणाम! और महिमा जी को सम्मान!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    आदरणीया सरिता दी फिर कहूँगी हर नारी सरिता है …और सबकी महिमा है :)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    जवाहर सर नमस्कार , क्या बात है ..आज तो आप सरिता की महिमा के साथ बहा ले गए..:) आपको शत शत नमन

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    अनिल जी ,नमस्कार आपने जो सुझाव दिए है कविता को और सार्थक रूप देने के लिए उसके लिए आपका ह्रदय से आभार , आपने जो पंक्तियाँ जोड़ी है समय निकल कर संसोधित करुँगी..

anupammishra के द्वारा
14/04/2012

सब्जेक्ट के साथ  न्याय नहीं हुआ   मोहतरमा…नदी बह तो रही थी लेकिन न जाने किस  रास्ते पर…

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/04/2012

    आदरणीय अनुपम जी , नमस्कार , स्वागत है आपका , आपके स्पस्ट विचार का स्वागत है ..कोशिश करुँगी न्याय हो..साभार


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