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मायाजाल

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मायाजाल

मैंने अपने अंदर बना डाले हैं

अजीब से दायरे 

अनेक बंधन 

अनेक विचार 

मैंने पाल रखे हैं

अजीब सी मान्यताएं 

अनेक नियम 

अनेक प्रथाएं

इनसे निकल नहीं  पाती

घुमती रहती हूँ उसी में

बाहर जा नहीं पाती

मैंने कही भी नहीं

खुले  रखे हैं दरवाजे

डाल रखे हैं दरवाजो पे

बड़े बड़े ताले

खो बठी हूँ उनकी चाभियाँ

नहीं ढूंढने   जाती हूँ उन्हें

सोच रखे हैं कई बहाने

बाहरी हवाएं नहीं आती

मौसम भी नहीं बदलते

सूरज की किरणें  भी

लौट जाती है टकराकर

दो पल खुश हो जाती हूँ

अपने इंतजामात पर

पर अगले पल ही छा जाता है

घनघोर अँधेरा

मुश्किल होता है

ये जानना

दिन है या  रात हो गयी है

सच है या

 है कोई मायाजाल



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47 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
03/05/2012

मैंने कही भी नहीं खुले रखे हैं दरवाजे डाल रखे हैं दरवाजो पे बड़े बड़े ताले खो बठी हूँ उनकी चाभियाँ नहीं ढूंढने जाती हूँ उन्हें सोच रखे हैं कई बहाने महिमा जी सुन्दर और गहन भाव लिए रचना ..काश ये ताले टूट जाएँ अँधेरा न छाये सब कुछ सुहाना हो रौशनी बिखरे मानव खुद पर नियंत्रण रखे तो आनंद और आये जय श्री राधे भ्रमर ५

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    04/05/2012

    आदरणीय भ्रमर सर , आपके बहुमूल्य और सन्देश युक्त प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद

चन्दन राय के द्वारा
03/05/2012

महिमा जी, जो इंसान अपने भीतर से मुह नहीं चुराता , वह बहुत ही सदगुनी होता है , और आपने अपने भीतर के मनोभाव को बहुत ही सुन्दर पिरोया

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    04/05/2012

    चन्दन जी नमस्कार , आपके अनमोल प्रतिक्रिया के लए आपका तहे दिल से शुक्रिया … :)

03/05/2012

महिमा जी नमस्कार, सच्चाई बयां करती रचना आपकी, मनुष्य इसी मायाजाल में तो उलझा रह जाता है…

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    04/05/2012

    गौरव जी , नमस्कार , सहमत हूँ ..हार्दिक धन्यवाद आपका

jyotsnasingh के द्वारा
02/05/2012

महिमा जी , बहुत अच्छी कविता ,पर अपने बनाये माया जाल को आप सवयम ही काट सकती हैं. अगर चाहें तो ज्योत्स्ना.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीया ज्योत्स्ना जी .. सहमत हूँ आपसे मायाजाल को समझ कर उसे समय के साथ हमे स्वयं काटना है .. आपका ह्रदय से धन्यवाद

sanjay dixit के द्वारा
02/05/2012

महिमा जी नमस्कार मनः स्थिति का प्रभावशाली चित्रण मैंने कही भी नहीं खुले रखे हैं दरवाजे डाल रखे हैं दरवाजो पे बड़े बड़े ताले खो बठी हूँ उनकी चाभियाँ नहीं ढूंढने जाती हूँ उन्हें सोच रखे हैं कई बहाने बाहरी हवाएं नहीं आती मौसम भी नहीं बदलते सूरज की किरणें भी लौट जाती है टकराकर दो पल खुश हो जाती हूँ अपने इन्तामाजात पर पर अगले पल ही छा जाता है घनघोर अँधेरा ———————बहुत अच्छा ,साधुवाद

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीय संजय जी , आपका ह्रदय से धन्यवाद आपने समझा , सराहा और उत्साहवर्धन किया ..साभार

rekhafbd के द्वारा
02/05/2012

महिमा जी ,यह जीवन मायाजाल ही तो है ,जिस हम सच समझतें है ,जो सिर्फ आँखें बंद ,होने तक है ,सुंदर प्रस्तुती बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीया रेखा जी , हाँ सहमत हूँ आप से .. आपका ह्रदय से धन्यवाद

yogi sarswat के द्वारा
02/05/2012

पर अगले पल ही छा जाता है घनघोर अँधेरा मुश्किल होता है ये जानना दिन है या रात हो गयी है सच है या है कोई मायाजाल बहुत सुन्दर भाव , महिमा जी ! कुछ टाइपिंग गलती है उसे सही कर लें , वैसे मतलब समझ आ रहा है ! आपने इंतजामात को इन्तामाज़त लिख दिया है ! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीय योगी जी , आपका हार्दिक धन्यवाद .. साथ में आपने टाइपिंग गलती बतलाई आभारी हूँ अभी ठीक करती हूँ

Mohinder Kumar के द्वारा
02/05/2012

महिमा जी, सुन्दर भाव अभिव्यक्ति भरी रचना. सचमुच आदमी अपने चारो और भ्रमजाल का ताना बाना बुन कर उसमें मकडी की तरह उलझ जाता है. परन्तु कभी कभी यही जाल हमें मरकंडा सांड बनने से रोकता भी है. यही यह सब बन्धन न हों तो मनुष्य भटक कर गलत राह पर भी जा सकता है. लिखते रहिये.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीय मोहिंदर जी , नमस्कार होसला अफजाई के लए आपका बहुत -२ शुक्रिया .. बिलकुल सहमत हूँ आपसे कभी हम उलझ जाते है और आगर नहीं बढ़ पाते और कभी हमे भटकन से भी बचाता है .. साभार

sadhna के द्वारा
02/05/2012

मुझे तो सच ही लगता है ये मायाजाल…… ” दो पल खुश हो जाती हूँ अपने इन्तामाजात पर पर अगले पल ही छा जाता है घनघोर अँधेरा” ……. अभी कुछ दिनों पहले मैं ऐसा ही कुछ महसूस कर रही थी….. बहुत सुन्दर प्रस्तुति महिमा जी….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    प्रिय साधना जी ये सब के साथ होता है .. तभी तो हम दुसरो की मन:स्थिति को समझ जाते है .. यही जीवन है … आपका हार्दिक धन्यवाद

follyofawiseman के द्वारा
01/05/2012

कोई चार बार ‘मैं’ शब्द का प्रयोग किया गया है….. ये बातें कहने की तो हैं….लेकिन सुनाने की बिल्कुल भी नहीं….!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    हा हा हा वेल said

vikramjitsingh के द्वारा
01/05/2012

सुन्दर प्रस्तुति……

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    धन्यवाद विक्रम जी , क्या बात ..सब ठीक तो है :)

mparveen के द्वारा
01/05/2012

महिमा जी ये जीवन मायाजाल ही है ! दूर से देखो सुनहरा लगता है जितने पास जाओ गहराता चला जाता है ! इस जीवन को जीते हुए न जाने कितनी बेड़ियाँ हैं जो पाँव में डाले हुए चलना है ! कोई बंधन न होते हुए भी न जाने कितने बन्धनों में जकड़ा हुआ है ! बहुत सुंदर….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    बिलकुल आपसे सहमत हूँ आदरणीया परवीन जी .. हम सब एक ही नाव पे सवार है . आपका ह्रदय से धन्यवाद

pawansrivastava के द्वारा
01/05/2012

आपकी कविता में दर्शन का अच्छा पूट मिलता है महिमा जी ..लेकिन नियतिवाद का …बहुत खूबसूरत

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    वो तो है पवन जी , मैं नियति को मानती हूँ क्योंकि हर बार मैंने इसे मह्सुश किया है या कहे भोगा है आपका शुक्रिया , नियति पे अलग से कविता भी है .. कभी पोस्ट करुँगी अभी नहीं क्योंकि कुछ ज्यादा निराशा वाद फ़ैल जायेगा :)

akraktale के द्वारा
01/05/2012

महिमा जी सादर नमस्कार, सच है मायाजाल ही तो है.सुन्दर प्रस्तुति.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीय अशोक सर , नमस्कार , आपका ह्रदय से dhanywaad

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
01/05/2012

बहुत अच्छी कविता,महिमा जी. बाहरी हवाएं नहीं आती मौसम भी नहीं बदलते सूरज की किरणें भी लौट जाती है टकराकर दो पल खुश हो जाती हूँ अपने इन्तामाजात पर पर अगले पल ही छा जाता है घनघोर अँधेरा सुन्दर पंक्तियाँ.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीय राजीव सर , नमस्कार , आपका ह्रदय से धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
01/05/2012

महिमा की महिमा अपार, दिनेश का नमस्कार, अंधविश्वास  पर कठोर प्रहार, इन  विचारों पर लगा रक्खा है कुछ  लोगों ने प्रतिबंध, शेर घूम  रहें हैं, कहीं कर न लें शिकार, ऐसे विचारो की ही जरूरत है आज  हमारे देश  को, मुझे तो बहुत पसंद आये आपके उद्गार, लगता है मेरे विचारों को मिल  गये हैं शब्द, अतः आपका व्यक्त  करता हूँ आभार……

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीय दिनेश सर , नमस्कार आपको अच्छी लगी हार्दिक धन्यवाद .सच तो यही हम सभी विचारों और प्रथाओ से जकडे है … .. थोड़ी सी flexiblity तो चहिये

omdikshit के द्वारा
30/04/2012

महिमा जी, यह सच तो बिलकुल ही नहीं हो सकता,क्योंकि, ऐसे वातावरण में कोई जिंदा ही नहीं रह सकता.बधाई,जिंदा रहकर,कविता लिखने की.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    :) धन्यवाद दीक्षित जी

ANAND PRAVIN के द्वारा
30/04/2012

महिमा जी, नमस्कार यह जीवन भी तो मायाजाल ही है……… समझ समझ का फेर है……………..जो समझ सका वो निकल लिया ….जो ना समझा वो आजतक फंसा हुआ है…………..कुछ शब्द जोरदार है…..बहोत बधाई आपको

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    बिलकुल सही कहा आपने आनंद जी .. जो समझ गया वो निकल जाता है जिंदगी के मायाजाल से , आपका ह्रदय से धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
30/04/2012

स्नेही महिमा, शुभाशीष. अगर इसे रचना की द्रष्टि से देखा जाए तो बधाई. बहुत सुन्दर. अगर vastvikta है तो ईलाज ही सहारा है.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    02/05/2012

    आदरणीया महिमा जी सादर प्रणाम. आदरणीय कुशवाहा जी के विचारों से सहमत. प्रस्तुति सुन्दर है….खूबसूरत है…….. बधाई………..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    सर प्रणाम , रचना की द्रष्टि से आपका हार्दिक धन्यवाद , और वास्तविकता के लिए आप सब है ही मेरा मानसिक इलाज करने वाले … मनोचिकित्सक :) :) मुझे कही और जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी :)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    अजय जी नमस्कार , आपका ह्रदय से शुक्रिया जनाब ..इलाज तो हम सब का होगा जनाब .. jj par …. kya kahte hai :) हम सब एक दुसरे के चिकत्सक ही तो है

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    03/05/2012

    मोहतरमा ! बात तो आपने सौ टके की है. यहाँ हम सब एक दूसरे के चिकत्सक ही तो है. आप कुछ कहें और गलत हो , ऐसा हो ही नहीं सकता…..:) :) :)

yamunapathak के द्वारा
30/04/2012

bandhan,daayre सही होते हैं अगर वे तर्कसंगत हों तो.बहुत अच्छी लगी ये कविता.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    धन्यवाद आदरणीया यमुना जी , सही कह आपने ….

30/04/2012

देवी जी अपने मायाजाल के शब्दों को सही कर लीजिये वरना अर्थ का अनर्थ हो जायेगा…फिर पता चला कि शिकार शेर के शिकार कीचाहत में कोई चूहा मारा जायेगा…..हाँ….हाँ….हाँ….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    हा हा बाबा जी चूहा तो सबसे खरनाक होता है …..

30/04/2012

मित्र, दीदी तो तुम्हें बच्ची कह रही थी. यहाँ देख रहा हूँ कि बच्ची माया जल फ़ैलाने में लगी हुई है……हाँ काली माँ कि बच्ची माया नहीं फैलाएगी तो कौन फैलाएगा……भाई यहाँ से जल्दी बचकर निकल लो वरना….माया में फसने का डर है ……

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    02/05/2012

    ओये बाबा के बच्चे, हां बच के रहना नहीं तो……


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