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वो गाँव कहाँ है .....

Posted On: 28 May, 2012 Others में

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वो गाँव कहाँ है
वो अमराई कहाँ है
वो झूले पे झुलना
फाग , कजरी औ चैता गाना
वो पनघट कहाँ है
भरी दुपहर में
भैंसों के संग बालको का नहाना
वो पानी की छप छप
और कपडे की धप्प धप्प
वो कोयल की कु कु
और मेढक की टर्र टर्र
जैसे कोई नया राग का छिड़ जाना
वो दादी का दिठोना
अम्मा का मनाना
ये मैना का है , ये गौरैया का कौर
कह कह के खिलाना
वो नयी दुल्हनिया को
ये भौजी , ओ भौजी कह के
पीछे पड़े गाँव का हर दीवाना
वो खेतो के मुंडेरो से होके
हर रोज स्कुल जाना
कभी मटर और कभी कच्ची भिन्डी को
तोड़ तोड़ खाना
साँझ होते ही फिर इकठे होकर
रमिया काकी को घेर बैठ जाना
फिर उनका भूतो- पिसाचो का किस्से सुनाना
और रात भर भूतो के डर से थर्र थर्राना
कभी बखोरी चाचा से उनके दुखरे का सुनना
कब और कैसे उनकी रामदुलारी भैसे का
चरते हुए जंगल में खो जाना औ
भरी दुनिया में उनको अकेला कर जाना
कभी मदारी का तमाशा
और कभी सपेरो का बीन से नाग का नचाना
कभी तालाब के कीचड़ में धस के
गबरू जवानों का मछली पकड़ना
फिर बड़े मनुहार से पकोड़े तलवाना
और चाचा , ताऊऔ को बुलाकर जिमवाना
कभी रमजान चाचा के टमटम पे बैठ
शहर घुम के आना
बहुत कुछ कही अनकही
रह गयी है अभी तो
है दिलो में भूली बिसरी यादो की छांव
अब तो है बस फरियादों में गाँव

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57 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
06/06/2012

महिमाजी,आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी. मैंने अपनी सहेली की याद में एक कविता लिखी थी अमराइयां गाँव की.

umeshshuklaairo के द्वारा
05/06/2012

है दिलों में भूली बिसरी यादों की छाँव अब तो है बस फरियादों में गाँव बहुत ही सटीक अभिव्यक्ति

मनु (tosi) के द्वारा
03/06/2012

क्या खूब महिमा श्री जी आपने तो बचपन याद दिला दिया ,,, सही कह रही हैं आप अब तो है बस फरियादों में गाँव… बहुत बढ़िया ,,,बधाई !!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
02/06/2012

वो दादी का दिठोना अम्मा का मनाना ये मैना का है , ये गौरैया का कौर कह कह के खिलाना वो नयी दुल्हनिया को ये भौजी , ओ भौजी कह के पीछे पड़े गाँव का हर दीवाना क्या बात है महिमा जी आप की महिमा भी न्यारी ही है बहुत सुन्दर चित्रण ..आनंद दाई सपने में खो गए हम तो …अब जब सब बदल जा रहा है तो गाँव पर भी मेहँदी के रंग तो चढ़ेंगे ही न उस रूप में भौजी अब शायद ही मिलें …जय श्री राधे भ्रमर ५

utkarshsingh के द्वारा
30/05/2012

महिमा जी , सादर नमस्कार | आपकी सारगर्भित टिप्पड़ी ने आपके चिट्ठे पर आने की प्रेरणा दी | एक सार्थक रचना के लिए साधुवाद | महाकवि पन्त के शब्दों में कहू तो – “आहा ! ग्राम्य जीवन भी क्या है | ” आपकी इन पंक्तियों ने – अम्मा का मनाना , यह मैना का , यह गौरया का कौर , कह – कह कर खिलाना | – ने मन को मोह लिया | यहाँ ‘कह कर खिलाना ‘ खिलाना भी हो सकता था , पर ‘कह-कह ‘ के प्रयोग से अम्मा का प्रेम पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है | ढिठौना और जिमवाना – देशज शब्दों का प्रयोग प्रसंशनीय है | एक उत्तम रचना |

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    31/05/2012

    उत्कर्ष जी सादर नमस्कार .. स्वागत है आपका … आपने मेरे सबसे प्रिय बचपन की यादो में से उस पल को इंगित किया जो मेरे ह्रदय के बेहद करीब है और उस पे सार्थक समीक्षा दिया आपका तहे दिल से शुक्र गुजार हूँ / आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया ने रचना का मान बढ़ा दिया है … आभारी हूँ

आर.एन. शाही के द्वारा
30/05/2012

महिमा जी, सबसे पहले तो खेद प्रकट करना चाहूँगा कि आपके इस ब्लॉग पर दुबे जी के लिए लिखी गई मेरी प्रतिक्रया उनकी टिप्पणी के नीचे की बजाय गलत जगह पोस्ट हो गई. उम्मीद है आपको कोई भ्रान्ति नहीं हुई होगी. दुबे जी ने शायद बात को समझते हुए उसपर अपनी जवाबी टिप्पणी डालकर संशय समाप्त किया, उनकी समझदारी को साधुवाद . आपका गाँव बड़ा प्यारा है. कोई चीज़ छोडी नहीं, सबको समेटा है. बधाई स्वीकार करें. लेकिन आपने उस तहलका वाली लड़की को जो मंच का चार चक्कर लगवाकर शोले की बातूनी बसंती वाली अपनी ख़ास स्टाइल में टेशन तक छोड़ कर ही दम लिया, ये कुछ ठीक नहीं किया. अरे एक दो ब्लॉग के बाद रास्ते पर आ जाती बेचारी. आप तो पंजे झाड़कर ही पीछे पड़ गईं. अब आगे कृपया ऐसा जुल्म मत करना, और मेरी बात को अन्यथा भी मत लेना. कहीं दिखे तो उसे फिर से प्रेरित करने में कोई बुराई नहीं है. नए-नए में सभी थोड़ा इधर उधर करते हैं, यह कोई असामान्य बात नहीं है.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय सर , सर्वप्रथम तो आपका स्वागत है.. पहलीबार मेरे ब्लॉग पे आये / सर कैसी बात करते है खेद काहे का .. अजय जी के बहाने ही सही कितना रोचक प्रसंग सुनने को हमे मिला / कल ही उस पे मैं टिपण्णी देती पर लोगिन काम ही नहीं कर रहा था / रचना के लिए आपकी प्रशंसा बहुत ही मायने रखती है सर / आपका ह्रदय से आभारी हूँ / सधन्यवाद / जहा तक बसंती वाली बात है सर तो महोदया बहुत दिनों से चोरी वाला कार्य कर रही थी पर इस बार साबुत हाथ लग गया और रंगे हाथो पकड़ी गयी / अगर कुछ इमानदारी से लिखने की क़ाबलियत होती तो क्षमा मांगे के कुछ अपना लिखा ले के आती ना की बोरिया बिस्तर समेत गायब हो जाती / प्रेरित तो मैंने उसे उस वक्त भी किया था की कुछ अपना लिखिए महोदया कौन लोग नए में इधर उधर करते है मुझे नहीं मालुम / पर मैंने कभी भी इधर उधर नहीं किया है इसलिए मुझे आश्चर्य होता है / पर आपकी बात को ध्यान रखूंगी / आलेख में तो आकडे लेने ही पड़ते है सभी को .. पर उसने तो पूराआलेख दुसरे का अपने नाम से टाइप कर दिया था / आप अपनी जगह पे सोच के देखिये सर आपका कोई आलेख कहीं कोई अपने नाम से पोस्ट कर दे .. कैसा अनुभव करेंगे / सभी को अपने रचनाये संतान जसी प्रिय होती है इस बात से आप सहमत है ना सर / अगर मैंने फिर बसंती वाली स्टाइल में ज्यादा बक बक कर गयी तो माफ़ी चाहूंगी सर / अप हमारे बुजुर्ग है / आपका कहा टाल सकते है क्या / आगे से ध्यान रखूंगी :)

rekhafbd के द्वारा
30/05/2012

महिमा जी , वो पानी की छप छप और कपडे की धप्प धप्प वो कोयल की कु कु और मेढक की टर्र टर्र,बहुत बढ़िया बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीया रेखा जी , आप हमेशा समय निकाल कर मेरा उत्साहवर्धन करती हैं आपको अच्छा लगा ..ह्रदय से धन्यवाद

follyofawiseman के द्वारा
30/05/2012

“वो गाँव कहाँ है …..” वो गाँव दरभंगा से बीस किलोमीटर दूर….सिंघवाड़ा प्रखंड मे स्थित है….उस गाँव का नाम ‘कलीगाँव’ है….हर दिन दरभंगा बस स्टॉप (कादिराबाद) से शाम 5 बजे बस खुलती है कलीगाँव के लिए! इसी गाँव के पास एक गाँव है “भड़वाड़ा” इसी गाँव मे ‘गोनु झा’ का जन्म हुआ था

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    हा हा हा हा हा हा हा बहुत खूब .. धन्यवाद मेरी खोजपूर्ण हुयी .. :)

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
30/05/2012

स्नेही महिमा , सादर ईश पुत्री की पिछली पोस्ट जिसमें गाँव का चित्रण है और आपकी व् उनकी व्यथा है. मैं ये पोस्ट आज पढ़ रहा हूँ. पर मैंने भी गाँव पर लिखा है. कुछ बातें आपकी भी उस रचना में हैं. महिमा, दीप्ती और सरिता (जी ) के रचना के आधार पर मैं भी लिखता हूँ. नए विचारों के लिए समय ही कहाँ है आशा है स्वागत करेंगी. आपकी रचना bahut sundar है, बढ़िय चित्रण है. गाँव का नजारा घूम गया आँखों में. बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय सर , सादर चरण स्पर्श आपकी विनम्रता जग विदित है .. आप तो हम सब छोटे पंछियों के बरगद है जिसकी छाव में हम सुकून पाते हैं और चैन की वंसी बजाते है और खुश होकर जागरण के आकाश में विचरण करते फिरते हैं / आपकी कविता का इंतज़ार है .. आपका आशीर्वाद सर पर रहे यही ईश्वर से कामना है / सादर

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    01/06/2012

    snehi mahima dhanyvaad

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
29/05/2012

महिमा श्री जी, सादर- सुन्दर , भावात्मक, उत्कृष्ट ,,,,,,,,,,, गांव का मनोहारी चित्रण ………………..लाजवाव रचना. बधाई………

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय अंकुर जी हार्दिक धन्यवाद आभारी हूँ . क्या बात है कम शब्दों में ही आपने कितना सुंदर प्रतिक्रिया दी है आपने मेरा मन बढ़ा दिया :० खुश कर दिया

Mohinder Kumar के द्वारा
29/05/2012

महिमा जी, ई मुवा शहर खाई गया सब कुछ..धीरे धीर गांव शहर होने लगे या फ़िर जो शहर की तरफ़ गया वो लौटा ही नहीं… पता नहीं सडक इक तरफ़ा कैसे हो गई.. भाव भरी रचना के लिये बधाई.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय मोहिंदर जी .. बिलकुल सही कहा आपने … बिलकुल कवी की भाषा में इ सड़क इकतरफा कैसे हो गया ……… चिंतनीय है … आपका ह्रदय से धन्यवाद

आर.एन. शाही के द्वारा
29/05/2012

दुबे जी, मेरे पड़ोस के गाँव के एक मेरे पूजनीय चुम्मन बाबा थे, चुम्मन तिवारी (असली नाम नहीं बताऊँगा) । वह भी आपही की तरह कम्बल ओढ़ कर घी पीते थे । गाँव घर की नजर में शुद्ध शाकाहारी और पूजापाठ वाले परम्परावादी बाबा । पोल तब खुली जब हम एक साथ धंधे के सिलसिले में अपने गृहराज्य से बाहर मिले । मैं जानबूझ कर उन्हें एक ऐसे रेस्टोरेन्ट में ले गया, जहाँ शाकाहारी भी खाया जा सकता था, तथा वाइन एन्ड डाइन की भी उत्तम व्यवस्था थी । अपने लिये बीयर मंगवा कर उन्हें दिखा-दिखा कर चुसकने लगा, तो टेबल के नीचे उनके दोनों पाँव ज़ोर-ज़ोर से ऐसे हिलने लगे, जैसे मिर्गी का दौरा पड़ने वाला हो । मैंने यूँ ही पूछा कि बाबा आपने तो कभी चखी भी नहीं होगी । जवाब में सुर्ती से पीले पड़ चुके दाँत निकाल कर हें हें हें हें करने लगे । मैं सब समझ गया, और बिना एक क्षण खोए उन्होंने मुझे अपना हमराज बना लिया । दो घंटे बाद जब हम उठे, तो टेबल पर उनके सामने चिकेन तन्दूर और फ़िश फ़्राई की बची हड्डियों और काँटों का ढेर लग चुका था, ज़ुबान और पाँव दोनों ही लड़खड़ा भी रहे थे । मुझे आप भी आज कुछ-कुछ चुम्मन बाबा जैसे ही दिख रहे हैं । गलत हो तो कान पकड़ने के लिये तैयार हूँ ।

    Ajay Kumar Dubey के द्वारा
    29/05/2012

    परम आदरणीय गुरुदेव सादर प्रणाम आप कहें और बात गलत हो ऐसा हो ही नहीं सकता . कहते हैं न …एक माता ही अपने पुत्र को सही से जानती है या फिर गुरु ही अपने शिष्य को पूरी तरह से जनता है. वैसे भी हम देवरिया के बाभन ठहरे …. अब हम देवरिया का नाम तो खराब कर सकते नहीं. हें..हें..हें..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    हा हा हा हा हा .. बड़ा मजा आया .. आदरणीय shahi सर अजय जी की अच्छी खबर ली आपने जनाब पेट पूजा लिए मेरी तालाब की मछलियां चुरा के ले जा रहे थे ….बिना इजाजत के असली बात सामने आ आगयी ना :) सर धन्यवाद बड़ा ही रोचक प्रसंग सुनाया हम सबको अपनी ही स्टाइल में यादो के पिटारे से …

    Ajay Kumar Dubey के द्वारा
    30/05/2012

    महिमा जी कल से इंतजार कर रहे थे कि आप कुछ बोलें. बोलीं भी तो चोरी का इलज़ाम लगा दिया. मोहतरमा…मछली आपके गाँव के लोगों ने श्रद्धा के साथ विदाई में दी थी. हाँ यह नहीं जानते कि कहाँ से ला कर दी. वह आप के तालाब की थीं या फिर ग्राम सभा के तालाब की थीं. एक बात तो बताना ही भूल गया था.. आपके यहाँ मैंने मटर और भिन्डी भी खायीं और पोटली भी बाँध ली. आप रहतीं तो पता नहीं मिलता भी या नहीं. शुक्र है आप नहीं थीं. मैं अक्सर देख रहा हूँ कि जब भी गुरु और शिष्य का संवाद हो रहा है तो मजे लेने के लिए बीच में टपक आ रही हैं. मेरी क्लास लग रही है तो आपको मजा आरहा है. घबराईये न…जल्दी ही मेरा भी मौका आएगा……:) :) :) मेरे भी चहरे पर स्माईल छाएगी.

yogi sarswat के द्वारा
29/05/2012

आदरणीय महिमा श्री जी , सादर नमस्कार ! बहुत ही सुन्दर गाँव का चित्रण ! किन्तु अब भी ऐसे गाँव हैं ? मुश्किल सा लगता है ! बहुत प्यारी सी कल्पना ! साँझ होते ही फिर इकठे होकर रमिया काकी को घेर बैठ जाना फिर उनका भूतो- पिसाचो का किस्से सुनाना और रात भर भूतो के डर से थर्र थर्राना कभी बखोरी चाचा से उनके दुखरे का सुनना कब और कैसे उनकी रामदुलारी भैसे का चरते हुए जंगल में खो जाना औ भरी दुनिया में उनको अकेला कर जाना

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय योगी जी नमस्कार .. आपको रचना अच्छी लगी . मन खुश हो गया / है तो जरुर / तभी तो गाव पे लिखी सभी रचनाओ में सभी घटनाएं मिलती जुलती ही होती है / और भारत तो कृषि प्रधान गाव का ही देश है / आपके प्रतिक्रिया के लिए हरदे से आभारी हूँ / सधन्यवाद

sadhna srivastava के द्वारा
29/05/2012

वाह बहुत सुन्दर गाँव है आपका…. :) मेरा तो मन होने लगा अब गाँव जाने का…. :) :)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    साधना जी स्वागत है आपका :) तो घूम आइये ना देर किस बात की .::) आपका दिल से शुक्रिया

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
29/05/2012

आदरणीया महिमा जी सादर प्रणाम आपके गांव आये . बहुत सुन्दर है आपका यह गांव. बहुत अच्छा लगा यहाँ आ कर. मन प्रफुल्लित हो गया. अब हम जा रहे हैं. साथ में करनी ( विदाई ) में मिली मछली भी लिए जा रहे है. पंडित आदमीं मछली का क्या करेंगे . लेकिन हम अपना धर्म कैसे छोड़ दें . जो श्रद्धा-भक्ति से मिल जाये उसे ग्रहण करना हमारा धर्म है. नहीं होगा तो किसी को दे देंगे . इसी बहाने कुछ दान-पुण्य भी हो जायेगा.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय अजय जी . स्वागत है आपका :) आप सबको आनंदित करने का ही उद्देश था जो पूरा होता दिख रहा है :) मछली से पेट पूजा होगी की दान पूजा उसकी कलई तो ऊपर खुल गयी है :) मस्त रहिये , खुश रहिये … धन्यवाद आपका

अजय कुमार झा के द्वारा
29/05/2012

अब तो है बस फ़रियादों में गांव …………सच कहा आपने । एक एक पंक्तियों में आज का यथार्थ उकेर कर रख दिया । बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    अजय जी , नमस्कार स्वागत है .हम्म आज तो खबरिया चैनल हमारे गाव में भी पहुच गया :) ये तो बड़ी अच्छी खबर हा/ हम तो खुश हो गए :) आदरणीय अजय जी आपके बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिय हार्दिक आभार / सधन्यवाद / ऐसे ही आते रहे /

Santosh Kumar के द्वारा
29/05/2012

महिमा बहन ,.सादर नमस्ते बहुत कम रचनाएँ होती हैं जिनको एक ही सांस में पढ़ने का दिल करता है ,..आपकी यादें ऐसी ही हैं ,.सबकुछ दिखता सा लगा …वो गाँव अब यहाँ हैं …हमारी यादों में …हार्दिक आभार + बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    वन्देमातरम संतोष भाई जी .. अपनी व्यस्तता में भी समय निकाल कर आप बचपन में पहुच कर अवस्य आनंद उठाया होगा / यादो को सहजने के लिए हार्दिक धन्यवाद / आभारी हूँ / आपने इसे एक साँस में पढने की बात कह के मेरा मान बढा दिया /

dineshaastik के द्वारा
29/05/2012

वो पानी की छप छप और कपडे की धप्प धप्प वो कोयल की कु कु और मेढक की टर्र टर्र और रात भर भूतो के डर से थर्र थर्राना और कभी सपेरो का बीन से नाग का नचाना उपरोक्त पंक्तियों ने आपकी रचना को जीवंत  कर  दिया है। आपने मुझे भी अपे गाँव के प्रति आकर्षण  पैदा कर  दिया है। मैं भी खो गया गावों की यादों में।

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय दिनेश सर , आप सबको बचपन की सुखद यादो में ले जाना ही मेरा उदेश्य था .. जो पूरा हुआ / रचना की सराहना के लिए ह्रदय से आभारी हूँ / सादर

akraktale के द्वारा
29/05/2012

महिमा जी सादर नमस्कार, आप तो बस इतना सुन्दर गावों का वर्णन लिख लिख के रखो आने वाली पीढ़ी में बच्चे वाटर प्यूरीफायर से पानी भरते देख पूछेंगे क्या यही पनघट हैं और भौजी कोई कह के तो देखे बेचारा अंग्रेजी में इतनी मोटी मोटी गालियाँ खायेगा की फिर भाभी भी नहीं सीधे मैडम कहकर ही बुलाएगा. बहुत ही मनमोहक रचना की प्रस्तुति. सीधे गाँव के गलियारे और कंचे खेलने के दिन याद आने लगे हैं. बधाई.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय अशोक सर … “”"बच्चे वाटर प्यूरीफायर से पानी भरते देख पूछेंगे क्या यही पनघट हैं और भौजी कोई कह के तो देखे बेचारा अंग्रेजी में इतनी मोटी मोटी गालियाँ खायेगा की फिर भाभी भी नहीं सीधे मैडम कहकर ही बुलाएगा.”"” हा हा हा हा :) क्या खूब कही और बिलकुल सत्य कही … भौजी कहने पे तो मार पक्की है :) आपने मोलिक विचार के लिए आभारी हूँ .. आप सब कुछ पल सही बचपन के सुखद यादो में पहुच गए , लिखना सार्थक हुआ .. सादर धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
29/05/2012

महिमा बहन, सादर अभिवादन कुछ बाकी भी छोड़ेंगी की सब कह देंगी …… इतना सारा अनुभव वह भी पटना और दिल्ली में रहकर मुझे तो लगता है आप मेरे ही अगल बगल के गाँव की हैं! क्या ?? समय कम है!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय जवाहर सर … ठेठ गावं में तो कभी नहीं गयी और न रही हूँ / पर मेरा बचपन बिहार सरीफ जैसे कस्बे में बिता है .. जहा एक तरफ शहरी सुख सुविधा भी था तो दूसरी और खेत खलिहान और भैसे भी थे पनघट भी था .और गावं जैसा मस्ती और भोलापन भी था / सच कहू बाकी सब दृश्य मैंने वही देखे है और जिए है , हाँ कभी कजरी , चैता और फाग नहीं सुना है / आभारी हूँ आप सबको अपना सा लगा और कुछ पल के लिए सही आप सभी को अपने बचपन के पल में ले जा पाई /

29/05/2012

आदरणीय महिमा, जी! सादर नमस्कार! कभी बखोरी चाचा से उनके दुखरे का सुनना कब और कैसे उनकी रामदुलारी भैसे का चरते हुए जंगल में खो जाना औ भरी दुनिया में उनको अकेला कर जाना……………शायद गाँव इसलिए तो गाँव होता है. लोग एक दुसरे के सुख दुःख में निःसंकोच साथ देते है. अब तो इस बदले हुए परिवेश में एक दोस्त दुसरे दोस्त को मुश्किल में देखकर कब साथ छोड़ता है, उसे खबर ही नहीं होती………………………………………… धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती है, एक छाया सीढियाँ चढ़ती-उतरती है. ये दीया चौरस्ते का ओट में ले लो, आज आंधी गाँव से होकर गुज़रती है.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती है, एक छाया सीढियाँ चढ़ती-उतरती है. ये दीया चौरस्ते का ओट में ले लो, आज आंधी गाँव से होकर गुज़रती है….. वाह बहुत सुंदर … आपने लिखा है कमाल का लिखा है … बधाई आपको … आपके अनमोल प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से धन्यवाद ..

    30/05/2012

    जी, मेरा लिखा हुआ नहीं है …..किसी दुसरे शायर का है……यदि मेरा होता तो इन पंक्तियों में कहीं न कहीं मेरा नाम जरुर होता…………….मैं भावुक व्यक्ति जरुर हूँ ……..पर कोई अदाकार या चोर नहीं ……………….!

anoop pandey के द्वारा
28/05/2012

महिमा जी गाँव तो अभी भी हमारे आस पास हैं……….कल को हमारी संताने ऐसे ही गीत आज के छोटे शहरों पर लिखने वाली है. बस पैसे कमाने की होड़ ने सब छुड़ा दिया. पर सपना तो अभी भी किसी दिन चलो गाँव को ओर कहने का है. शायद कभी सच हो जाये…..सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    अनूप जी नमस्कार , स्वागत है आपका .. बिलकुल सही कहा बंधू .. आपसे सहमत हूँ … आपके प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया …

Rajkamal Sharma के द्वारा
28/05/2012

आदरणीय महिमा बहिन (श्री श्री एक सौ आठ ) जी …. सादर अभिवादन ! नारी नारी की दुश्मन बनती चली आई है इस कहावत को झूठा सिद्द करने के लिए ही मैंने तो बहुत ही खुश हो कर ज़बरदस्ती से ही आप सभी में कोई समानता तलाशी थी …… दिव्या बहिन की रचना में नहीं बल्कि उनके द्वारा मेरी पिछली रचना पर रात को लाईट जाने पर घर की बड़ी महिलाओं से भूत प्रेतों की कथाये सुनने के बारे में बतलाया था ….. क्योंकि सभी महिलाओं में कम से कम इस मंच पर तो तालमेल होना ही चाहिए …. आपके ब्लॉग पर एक मुद्दत के बाद प्रतिकिर्या देने में सफलता मिल पाई है ….. (वैसे मेरा यह मानना “था” की जो भी सरिता जी पहले करेगी आप उसको बाद में जरूर करेंगी –बेचारी के.जी. में पढ़ने वाली वोह चोरनी बच्ची जोकि इस मंच से फिलहाल चली गई है ) जय श्री कृष्ण जी :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय गुरुदेव , आपकी शुद्ध मनसा को समझने में विफल हो गयी इसके लिए मुझे अफ़सोस है .और ह्रदय से क्षमा चाहती हूँ / आप व्यंगकार है और बाते भी कभी -२ वैसे करते हैं और फिर इसलिए तो हम आपको गुरुदेव कहते है अगर हम समझ जाते तो वो क्या कहावत है चेला गुड … और गुरु चीनी . नहीं हो जाता .. याद नहीं आ रहा है ठीक ठीक .. माफ़ कीजियेगा ..:) और समझ जाईये :) जय श्री कृष्ण जी

ANAND PRAVIN के द्वारा
28/05/2012

महिमा जी, नमस्कार सबसे पहले तो आप यह बताइये की जो तस्वीर आपने ऊपर लगाईं थी “वो कहाँ है’ कहीं गाँव में गम तो नहीं हो गईं फिर ज़रा मुझे “दिठोना” का अर्थ समझाइये सर के ऊपर से निकल गया फिर आपकी रचना पर आता हूँ …………..मोहतरमा आपने जिस गाँव का जिक्र किया है ऐसा गाँव यदि आपका था तो बहुत ही अद्भुत और रोचक गाँव था जहाँ एक साथ इतने तथ्य थे ……………… रचना तो आपकी जोरदार होती ही है………….अब आपभी कविओं वाला गुण दिखाने लगीं है वरना एक गावों में …….भैस का जंगल में खोना ……….साप के लिए बिन बजाना ……..मोटर की आवाज़ …..टमटम …..मेढक ……और सबसे बढ़िया ……..हमार नाइकी भौजी का दिफिनेसन आपके द्वारा वाह वाह वाह वाह वाह हुजुर आप तो छा गए

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    प्रिय आनंद जी .. आप तो मुझे खुश कर देते हैं .. सच आपके शब्द कितना उत्साह बढ़ाते है बता नहीं सकती .. उर्जा का संचार होने लगता .. एकदम से जाग जाती हूँ .. हां पता नही तस्वीर क्यों गायब हो गयी है .. शायद मेरे शब्द गाव कहाँ है को चरितार्थ करने का कोशिश कर रही है :) :) “दिठोना” का अर्थ जब माँ या दादी छोटे बच्चे को नजर से बचने के लिए ललाट पर गोल काजल का टिका लगाती है उसी को दिठोना कहते हैं .. :) अब याद आ गया ना जब माँ ने आपको भी लगाया होगा :) आप सब आनंदित हुए .. यही प्रयास था लिखना सार्थक हुआ “वाह वाह वाह वाह वाह हुजुर आप तो छा गए ” :) :) :) :) आपने भी मुझे झार पे चडा दिया .. हम्म हम्म अब उतरने का मन नहीं कर रहा है .. नशा जैसा हो रहा है :)

चन्दन राय के द्वारा
28/05/2012

महिमा जी , आप तो गाँव के सदमे में ऐसी डूबी की आपने गाँव की पूरी की पूरी कलई खोल दी , मेढंक से टमटम, कच्ची भिन्डी से रमजान चाचा भूतो- पिसाचो से अमराई का मौसम सबको लपेटे में ले लिया , ये तो थी मजाक की बात , अब तक के आपके आलेखों में सब से ऊपर उत्कृष्ट की रचना , और इक और बात ऐसी कविता ही इस जागरण मंच के स्तर को और ऊपर उठा देती है , विश्वाश मानीय जितना लिखा , उससे कंही ऊपर की रचना है आपकी

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    प्रिय चन्दन जी , नमस्कार आज तो आपने मुझे झार पे चढ़ा दिया .. :) मजाक कर रही हूँ .. आपके शब्दों ने मुझ में उत्साहवर्धन का काम किया है .. जो प्रेरित कर रही है आगे भी अच्छा लिखने के लिए / आपका ह्रदय से धन्यवाद /

Rajkamal Sharma के द्वारा
28/05/2012

testing

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    28/05/2012

    इस कविता में सरिता और दिव्या बहिन से भी प्रेरणा ली गई है ….. आपका आपसी तालमेल देख कर अच्छा लगा ….. क्या उस गाँव में कोई भटियारिन नहीं थी जहाँ पर उसका हिस्सा देकर बाकि के दाने भुनवा कर गुड़ लगा कर खाया करते थे ? कोई गन्ने से गुड़ निकालना और गाँव का कोई सांझा त्यौहार वगैरह ?….. अगली बार कुछ इस पर भी लिखियेगा जय श्री कृष्ण जी :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    28/05/2012

    आदरणीय गुरुदेव .., स्वागत है ..बड़े दिनों बाद दर्शन दिए वैसे प्रेरणा लेना कोई बुरी बात नहीं है किन्तु मैं आपको बताना चाहूंगी मैंने दिव्या जी की कोई कविता नहीं पढ़ी है आज तक jj.pe / और सरिता दी की अब गाव कहा से पहले की मेरी कविता लिखी हुयी है / आप सरिता दी से पूछ सकते है / ये कविता “OBO लाइव महा उत्सव” अंक १९ जिसका विषय गाव था जो ८ अप्रैल से १० अप्रैल तक चला उसके लिए लिखा था मेरी कविता वंहा ८ अप्रैल को पोस्ट हुयी और और सरिता दी का १० अप्रैल को सबसे अंतिम में आया था / आशा है आपको गलतफहमी दूर हो गयी हो गी धन्यवाद आपका .

vikramjitsingh के द्वारा
28/05/2012

क्या महिमा जी…….लगता है आप तो बच्चों से भी गयी गुजरी हैं….. अरे ये बचपन की यादें हैं…..सभी के… इन को कोई नहीं भूल सकता…… वैसे…..एक बार फिर याद दिलाने का शुक्रिया….. नमस्कार….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    30/05/2012

    आदरणीय विक्रम जी , नमस्कार .. आपका ह्रदय से धन्यवाद

pawansrivastava के द्वारा
28/05/2012

महिमा जी आपका गाँव बड़ा प्यारा मैं तो गया मारा आके यहाँ रे :)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    28/05/2012

    हा हा हा .पवन जी स्वागत है … आपका ह्रदय से धन्यवाद ..


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