AKULAHTE...MERE MAN KI

bhavnaow ki abhivayakti ka ........ak aur khula darwaja

25 Posts

702 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8762 postid : 247

दो कवितायेँ किसान भाइयों को समर्पित

  • SocialTwist Tell-a-Friend

किसान भाईयों के लिए जो निरंतर आत्महत्याओं के लियें विवश हो रहे हैं

.मैं किसान हूँ

मैं बोता हूँ

गन्ने , चावल , आलू

सब्जियां और ना जाने

कितनी फसलें

खोदता हूँ मिटटी

प्यार से रोपता हूँ

देता हूँ स्नेह

इंच दर इंच बढ़ना

रोज ताकता हूँ

और नाच उठता हूँ

बढ़ता देख

गाता हूँ ख़ुशी के गीत

रात भर जगता हूँ

करता हूँ पहरेदारी

कोई देना उसे तकलीफ

उखाड़ ना दें कोई उसे

जड़ो से

पर मिलता हैं उसके बदले

मुठी भर रूपये

गरीबी , जहालत

लेनदारो का कर्ज

पत्नी की आँखों में दर्द

बच्चो का भूखे बिलबिलाना

बैलो का चारे बिना

तड़प तड़प के मर जाना

क्योंकि बोरी भर फसलें मेरी

बिक जाती हैं मिटटी के मोल

ठगा सा मैं खड़ा

देखता हूँ आकाश को

जेठ की धुप

क्या जलाएगी

अब तो तिल तिल   मर रहा हूँ

गले में कसी

कर्ज की हुक से ….

.

ये परजीवी ( खुदगर्ज   समाज को परजीवी संबोधित किया है )

ये जिन्दा रहें

फले फूलें

हँसे मुस्कुराएँ

नाचे गायें

इसके लिए

उन्हें देता हूँ

भूखे रह कर भी

अमृत रूपी अन्न

नाना प्रकार के सुस्वाद का

करता हूँ इंतजाम

ये सुंदर लगे

सजे सवरें

घर को भी

सुसज्जित करें

इसलिए नंगा रह कर भी

उपजाता हूँ कपास

आंधी -पानी हो

या कड़ी धूप

अथक डटा रहता हूँ

ताकि ये

निरंतर बढते रहें

सुखी रहें

पर इनकी भूख

सुरसा की तरह बढती ही जाती है

और एक दिन

मैं भी हो जाता हूँ

इनका ग्रास ….

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

56 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
29/10/2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला -

chaatak के द्वारा
16/10/2012

महिमा जी, किसानो की परिश्रम से पलती उन्ही के दम पर चलती ये दुनिया ना जाने कब उन्हें उनके हक़, उनके सम्मान को उन्हें प्रदान करेगी| इन खूबसूरत रचनाओं ने खुश कर दिया| हार्दिक बधाई!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    चातक जी , नमस्कार .. आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से धन्यवाद / आपको अच्छा लगा ये जानकार मुझे बेहद ख़ुशी हुयी / लेखनी को बल मिला / सभार

ashishgonda के द्वारा
15/10/2012

आदरणीया! सादर अभिवादन, आज ही आपका एक और ब्लॉग पढ़ा नियति वाला, और फिर ये पढ़ रहा हूँ, बहुत आवश्यक बिंदुओं पर सम्पूर्ण प्रस्तुति न ज्यादा लंबा है न छोटा, बिलकुल आवश्यकतानुसार दोनों कवितायेँ सराहनिए हैं, समझ नहीं पा रहा हूँ आज तक आप से मुलाकात क्यों नहीं हुई. आशा है आगे भी ऐसे ही पढाती रहेंगी. आशीष

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    प्रिय आशीष जी ..नमस्कार .. आपको किसान भाइयो को समर्पित मेरी काव्यांजलि पसंद आई ख़ुशी हुयी जानकार / आशा है भविष्य में सहयोग बना रहेगा / धन्यवाद आपका

MAHIMA SHREE के द्वारा
12/10/2012

नमस्कार आनंद जी .. दोनों कविताओ को पसंद करने के लिए आभारी हूँ / बहुत दिनों के बाद धन्यवाद दे रही हूँ आशा है अन्यथा नहीं लेंगे

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    12/10/2012

    सबसे बड़ी बात तो आपकी पुनः वापसी है…….अन्यथा जैसे शब्द हास्यास्पद हैं आपके बहुत दिनों बाद आगमन से ख़ुशी हुई…….

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
04/10/2012

महिमा जी प्रणाम ,बहुत ही अच्छी रचना के लिये बधाई ,,,,,,,,,मैं बोता हूँ गन्ने , चावल , आलू सब्जियां और ना जाने कितनी फसलें खोदता हूँ मिटटी प्यार से रोपता हूँ देता हूँ स्नेह इंच दर इंच बढ़ना रोज ताकता हूँ और नाच उठता हूँ बढ़ता देख गाता हूँ ख़ुशी के गीत रात भर जगता हूँ करता हूँ पहरेदारी

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    12/10/2012

    नमस्कार आदरणीय अनुराग जी .. आपका स्वागत है .. आपको रचना पसंद आई आभारी हूँ . आशा है आगे भी आपका प्रोत्साहन मिलता रहेगा

ANAND PRAVIN के द्वारा
14/07/2012

महिमा जी, नमस्कार काफी दिनों से मंच से दूर था इसकारण आपकी इस रचना को नहीं पढ़ पाया था बहुत ही सुन्दर बनी है आपकी दोनों ही रचना किसान bhaaiyon ki durdhasaa par aapkaa सुन्दर prakaash

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
13/07/2012

परम आदरणीया महिमा जी सादर प्रणाम …. किसान की व्यथा का सजीव चित्रण किया है. किसानों के दर्द को आप ने काव्यात्मक जुबां दी है… किसी किसान की पीड़ा से लिखी गई कविता लगती है यह…शायद आपका किसानी प्रमुख व्यवसाय था..किसानों की दुर्दशा के कारण ही आप आज रियल स्टेट में आ गयी है… आपकी यह कविता पढ़कर मुझे अपनी एक पोयम याद आ गयी लेकिन मैं उसे यहाँ लिखने से रहा…बस five star दे रहा हूँ …. चुपके से खा लेना…. अपने इस खजाने के साथ…आप मंच की बेहतरीन महिला रचनाकारों के ठीक सामानांतर खड़ी हो गई है… सुन्दर काव्यात्मक प्रस्तुति के लिए बधाई … विलम्ब के लिए क्षमा चाहूँगा

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/07/2012

    ?????????? ….:)

ajaykr के द्वारा
13/07/2012

परम आदरणीय महिमा जी ,सादर प्रणाम …. एक किसान परिवार का बेटा होने के कारण ,और आपकी कविता की सच्चाई……………….. ने दिल को छू लिया …दिनों दिन बढ़ता पेस्टीसाईड अन्न और जल में जहर घोल रहा हैं ,मृदा की प्राकृतिक इम्युनिटी उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रहा हैं …..समाज भी जागरूक हों रहा हैं …पर किसानो का उत्पाद आज भी सही कीमत पर नही जा रहा हैं ..मेहनत करता किसान हैं ,फायदे उठाते बिचौलिए लोग हैं …….अब तो GM CROPS भी आ गयी हैं ,पर इस बात की कोई गारंटी नही की हमारे स्वास्थ्य को कितना नुकसान पहुचएँगी क्यूंकि जो फसल छोटे कीटो को मार सकती हैं वह इंसानों को भी किसी ना किसी मात्रा में नुकसान पंहुचा सकती हैं ……..इस मंच पर पढ़े गए उम्दा ब्लोगों में से एक ब्लॉग ,बहुत आभार ….आपका अजय http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    नमस्कार अजय जी .. क्षमा चाहती हूँ / बहुत दिनों के अन्तराल के बाद आप सबको धन्यवाद प्रेषित कर रही हूँ / आपने इसे पढ़ा और इस कविता की भाव भूमि ने आपको इतना कुछ कहने को विवश किया / मेरा लिखना सार्थक रहा / सही कहा आपने म्हणत करता है किसान और फायदा उठता है बिचौलिए / कृषि प्रधान देश में किसान ही सबसे उपेछित है इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है / आपका आलेख मैं पड़ती रही हूँ बस प्रतिक्रिया नहीं दे पाई हूँ पर अब पूरा समय निकालूँगी/ आपका हार्दिक धन्यवाद

pritish1 के द्वारा
15/06/2012

नमस्ते महिमाश्री जी……. अपने लेखन मैं विलम्ब के लिए क्षमा चाहूँगा मैंने अपनी रचना ऐसी ये कैसी तमन्ना है…..का दूसरा भाग प्रकाशित किया है आप कहानी के पहले भाग से परिचित हैं………..मेरी कहानी पढें और अपने विचारों से मुझे अवगत करायें……. धन्यवाद..!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    13/07/2012

    नमस्कार प्रीतिश जी .. थोड़ी व्यस्त हूँ इस लिए समय नहीं दे पा रही हूँ .. जल्द ही आपकी कहानी पढूंगी …

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
14/06/2012

किसानों के दर्द को आप ने काव्यात्मक जुबां दी है ! बेबस एवं लाचार किसानों की यही दर्दनाक कथा है हिन्दुस्तान में और हम उन्हें अन्न -देवता कहकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं ! महिमा जी, सुन्दर काव्यात्मक प्रस्तुति के लिए बधाई !! पुनश्च !!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/06/2012

    आदरणीय आचार्य जी , नमस्कार आभारी हूँ .. आप सब के सकरात्मक विचार और टिप्पणियां कुछ सार्थक लिखने की प्रेरणा देती हैं ..

minujha के द्वारा
14/06/2012

महिमा जी नमस्कार किसान भाईयों की मजबूरी और आक्रोश दोनों को आपने न्यायपूर्वक प्रस्तुत  किया है..पर क्या कहें, सबको अपने स्वार्थ से मुक्ति मिले तब तो उस  निरीह की दशा पर ध्यान जाए आपने सोच कर शब्दबद्ध  किया बधाई हो आपको.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    मीनू जी नमस्कार .. बहुत दिनों बाद .. अच्छा लगा आपको देख के … आपकी बिलकुल सही और उत्कृष्ट प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ .. वाकई में आपकी समझ को सलाम …झट से मूल भाव को पकड़ लेती है … आभारी हूँ …सधन्यवाद

sinsera के द्वारा
12/06/2012

प्रिय महिमा जी , नमस्कार , मजबूर किसानों की स्थिति का बड़ा मार्मिक चित्रण … क्या कहे दर्द का मौसम है हमारे सर पे , भूल जाना कभी हम कुछ तुम्हे दे पायेंगे ……. ये बूंदें तुम कहाँ रखोगे गिरा बैठोगे , हम तो बादल हैं बरसें गे चले जायेंगे ….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीया सरिता दी .. बहुत दिनों बाद आपके दर्शन हुए आशा है … आपके ( स्वसुर) पिता जी स्वस्थ होकर घर आ गए होगें …. आपने ऐसा क्यूँ लिखा हैं “”क्या कहे दर्द का मौसम है हमारे सर पे ,”".. सब कुशल मंगल तो हैं .. बहुत निराशा दिखाई दे रही है .. ईश्वर से प्राथना है .. सब ठीक हो …

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
06/06/2012

महिमा जी, नमस्कार- किसान की व्यथा का सजीव चित्रण किया है आपने. सुन्दर रचना के लिए बधाई……..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    अंकुर जी .. आपका आभार …

05/06/2012

आदरणीय महिमा जी, आपकी यह कविता पढ़कर मुझे अपनी एक पोयम याद आ गयी जो आज से १० साल पहिले रची थी…..अभिव्यक्ति पर मत जियेगा सिर्फ भाव ही पकड़ियेगा क्योंकि उस उम्र में इससे बेहतर अभिव्यक्ति नहीं कर सकता था, फिर भी आशा करता हूँ कि आपको जरुर पसंद आएगी………… A True Son Of The Earth ___________________________ Who is example of hard work And the best teacher for everyone: None is other man Besides a ploughman. _____________________________ He has not more wealth. But he has good health; He loves his mother land, From which he gets harvest. ____________________________ He gets up in the morning early And goes to farms to futurity: when he does his work in farm, he sings a sweet song. _________________________ Though he work hard all day, He lives always gay: He has hope a lot When he sleep on the cot. ______________________ He keeps on his task, It may be cold or hot, He has a good mind Together he is kind. ____________________

    jlsingh के द्वारा
    07/06/2012

    Dear Anil jee, I like your poem as you have writen the truth! He keeps on his task, It may be cold or hot, He has a good mind Together he is kind. Thanks for your best feelings!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    अनिल जी नमस्कार , आपकी पोएम शानदार और जानदार है .. मुझे तो ये हर तरह से perfect लगी .. अगर आप दश साल पहले इतनी अच्छी eng poem लिखते थे तो अब तो और भी बेहतरीन लिखेंगे .. मेरा आशय है .. दोनों भाषाओ में आपकी पकड़ है तो ..इसे बढ़ाते जाए … आपको शुभकामनाएं …. इतनी उम्दा poem मेरे लिए इनाम की तरह है .. आभारी हूँ ..

akraktale के द्वारा
05/06/2012

महिमा जी सादर, दोनों ही सुन्दर रचनाएं बधाई. किसान को भगवान् भी कहा गया है क्योंकि वही हमारे लिए अन्न उपजाता है किन्तु उसकी दशा भी मंदिर में बैठे भगवान् सी हो गयी है. जहां मांगते तो करोड़ों के सपने पुरे होने का आशीर्वाद और चढाते हैं फटा नोट. कहते तो हैं की तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा और चढ़ा आते हैं एक रुपये का सिक्का. किसानो की पीड़ा किसी से छुपी नहीं है सरकार को किसानो में छोटे बड़े के हिसाब से भेद कर उनकी आर्थिक मदत करनी चाहिए.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय अशोक सर … आपकी प्रतिक्रिया से आपके अंदर चल रहे किसानो की दुर्दशा के प्रति आक्रोश झलक रहा है … यही तो मैं चाहती थी … हम सब कुछ देर उनकी दशा दिशा पर थोडा वार्तालाप करें .. अपने विचार रखे .. आपकी आभारी हूँ …

Mohinder Kumar के द्वारा
05/06/2012

महिमा जी, बिचोलियों के जाल में फ़ंसे किसान दम तोड रहे हैं. सरकारी खरीद नीतियां विफ़ल होने के कारण किसानों को सही दाम नहीं मिलता. विचोलिये बिना मेहनत अमीर हो रहे हैं और किसान मेहनत के बाबजूद गरीब. समसमायिक कविताओं के लिये बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय मोहिंदर जी ….. हां मैं इन्ही सब बातो को सबके साथ discuss करना चाहती थी … कुछ ही देर सही पर अपने अन्न देवताओ की पीड़ा से एक बार हम सब रूबरू तो हो … उनकी दशा दिशा का कभी तो ख्याल आये सबको .. यही मेरा उदेश्य था ..थोड़ी सफलता मिली … आभारी हूँ …सधन्यवाद

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
05/06/2012

सुन्दर कविता,महिमा जी.दोनों ही अच्छे बन पड़े हैं. देखता हूँ आकाश को जेठ की धूप क्या जलायेगी अब तो तिल तिल मर रहा हूँ गले में किसी कर्ज की हुक से. बहुत दर्दनाक पुनश्च: आखिरकार ब्लॉग पर आपका फोटो दिख ही गया.पहले सिर्फ chrome पर दिखता था.या,सिर्फ इसलिए कि यह कमेन्ट मुम्बई में बैठकर लिख रहा हूँ.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय राजीव सर …. आपका ह्रदय से आभार ….

Rajkamal Sharma के द्वारा
04/06/2012

पहली कविता वास्तव में ही बेमिसाल है लेकिन दूसरी में उसकी दशा के लिए पूरे समाज को दोषी ठहरा दिया गया है जल्दबाजी में ऐसा ही होता है मुझसे भी कई बार हुआ है और आगे भी होगा लेकिन आप आगे से ऐसा मत करना

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    04/06/2012

    करता हूँ पहरेदारी कोई (दे) (ना) उसे तकलीफ अब तो तिल -तिल मर रहा हूँ

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय राजकमल जी … आपको रचना अच्छी लगी .. आभारी हूँ .. आप सब के सकारात्मक विचारों ने मेरा हौसला बढाया है … और किसानो की दुर्दशा का मैं सब के साथ वार्तालाप करना चाहती थी .. और सबके समक्ष उनके कठिनाइयों को इंगित करना चाहती थी .. लगता है लिखना सार्थक हुआ …

pawansrivastava के द्वारा
04/06/2012

बस ५ सितारे दे रहा हूँ ..कुछ बोलूँगा नहीं ….:)

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    पवन जी धन्यवाद … :) :) आप चुप्प अच्छे नहीं लगते ..

allrounder के द्वारा
04/06/2012

नमस्कार महिमा जी, यधपि देश मैं कुछ हिस्सों के बड़े किसानों की हालत सुधरी है तथापि छोटे किसानों की हालत आज भी लगभग वैसी ही है जैसी आपकी कवितायेँ बयां कर रही हैं ! सार्थक रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    नमस्कार allrounder ji , स्वागत है आपका … बिलकुल सही कहा आपने .. छोटे किसानो की बिगड़े हालात की जिम्मेवार सरकार की गलत नीतियाँ हैं जिसमे बहुरास्ट्रीय कंपनियों के साथ करार करना .. उन्हें आधिकतम लाभ पहुंचाना .. किसानो को मजबूर करना अपने परम्परागत खेती और बीजो को त्याग कर विदेशी बीजो का उपयोग जो सिर्फ एक बार ही काम में लायी जाती हैं .. और अगर फसल किसी वजह से नष्ट हो गयी तो कर्ज से ली गयी बीजो का मूल्य चुकाना तो दूर उने खाने के भी लाले पड़ जाते हैं और मजबूरन आत्हत्या को विवश हो जाते हैं .. आपका ह्रदय से आभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
04/06/2012

स्नेही महिमा जी, सादर किसान की वास्तविक दशा का चित्रण / दयनीय दशा है, साहूकार मजे में. बधाई.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय प्रदीप सर .. सादर प्रणाम .. सही कहा आपने आज का साहूकार सरकार स्वयं है जिसके गलत नीतियाँ गरीब किसानो का दोहान कर रही हैं और आत्महत्या के लिए विवश कर रही हैं .. और सारा फायदा बहुराष्ट्रीय कम्पनियां उठा कर मौज कर रहीं और बड़े किसानो की चांदी बन आई हैं … सादर आभार

चन्दन राय के द्वारा
04/06/2012

महिमा जी , क्योंकि बोरी भर फसलें मेरी बिक जाती हैं मिटटी के मोल ठगा सा मैं खड़ा देखता हूँ आकाश को जेठ की धुप क्या जलाएगी अब तो तिल तिल मर रहा हूँ किसान के अंतस के दर्द को आपने यथासंभव बड़ी ही मार्मिक ,करुनामय स्वर दिया है , दूसरी कविता में भी वही स्वर उभरता है आप मंच की बेहतरीन महिला रचनाकारों के ठीक सामानांतर खड़ी हो गई है अपने इस खजाने के साथ

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    चन्दन जी …. देर से reply के लिए क्षमा .. थोड़ी वयस्तता और site का सही तरकर से काम नहीं करने की वजह से भी देर हो गयी .. आपकी जबरदस्त हौसला अफजाई बहरे शब्दों ने मेरा उत्साह भी बढ़ाया और साथ में जिम्मेवारी भी बढ़ा दी .. आपकी आभारी हूँ .. सधन्यवाद ..

vikramjitsingh के द्वारा
04/06/2012

महिमा जी…. यथार्थ के बहुत नजदीक हैं आपकी दोनों कवितायेँ….. थोड़ी ज़मीनों वाले किसानों का आज भी यही सच है……

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय विक्रम जी .. सच कहा है आपने … आभारी हूँ

अजय कुमार झा के द्वारा
04/06/2012

दोनों ही रचनाएं प्रभावी बन पडी हैं , यथास्थिति को उकेरती हुई सी । बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय अजय भाई … आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ . स्नेह बनाये रखे

dineshaastik के द्वारा
04/06/2012

महिमा जी नमस्कार, आपने अपनी कविता में किसान की वास्तिक  स्थिति का चित्रण  किया है। किसी किसान की पीड़ा से लिखी गई कविता लगती है यह। अगर मेंरा अंदाजा गलत हो तो क्षमा करें, शायद आपका किसानी प्रमुख   व्यवसाय था। सुन्दर प्रस्तुति के लिये बधाई…..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    आदरणीय दिनेश सर .. क्षमा कीजियेगा आपका अनुमान गलत है . :) जहाँ तक आपके ये कहना है की “”किसी किसान की पीड़ा से लिखी गई कविता लगती है यह।”"”" तो मेरी रचना के लिए ट्राफी से कम नहीं है … अगर वास्तव में ऐसा मह्सुश करवाती है तो मेरा रचना धर्म पूरा हुआ .. क्योकि मेरा मानना है वो कवी ही क्या जिसकी लेखनी समाज के हर वर्ग के दुःख और दर्द को आवाज ना दे सके और उसे मुख्य धारा में ला कर पाठको के समक्ष रख ना सके और उन्हें दर्द का भान ना करा सके आपकी आभारी हूँ ..

jlsingh के द्वारा
04/06/2012

स्नेही महिमा बहन, सादर! मैं हूँ किसान का ही बेटा देखी है मैंने उनकी ब्यथा गर्मी में लू जब चलती थी धरती प्यारी जब जलती थी बाबू जी खुश होते थे खलिहानों में ही सोते थे बारिश हो या आंधी पानी खेतों में जमता था पानी बाबूजी खुश होते थे खेतों में हल को जोते थे. सर्दी उनको न सताती थी सरसों उनको बहलाती थी जब सर्द हवा उनको लगती आत्मा उनकी तब थी जुड़ती बाबू जी खुश होते थे खेतों में ही वे सोते थे! यह है किसान की करुण कथा मैं ही हूँ उनका वह बेटा!

    vikramjitsingh के द्वारा
    04/06/2012

    आदरणीय जवाहर जी…. ‘सोने पर सुहागा’ है आपकी कविता……

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    वाह आदरणीय जवाहर सर .. आपकी रचना ने तो मेरी कविता का मान बढ़ादिया है … मेरा रेपली बत्तों काम नहीं कर रहा था इस लिए देर से आभार प्रकट कर रही हूँ …. आपका ह्रदय से धन्यवाद

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    14/06/2012

    reply button

anoop pandey के द्वारा
04/06/2012

महिमा जी; नमस्कार; व्यथा का अच्छा चित्रण और समाज पर अच्छा व्यंग. बधाई.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    09/06/2012

    आदरणीय अनूप जी , नमस्कार .. आपका बहुत-२ आभार ..


topic of the week



latest from jagran