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नियति तू कब तक खेल रचाएगी

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नियति तू कब तक खेल रचाएगी

क्या हम सचमुच हैं

तेरे ही कठपुतले

तू जैसा चाहेगी

वैसा ही पाठ सिखाएगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

कभी कुछ खोया था

कंही कुछ छुट गया था

कभी छन् से कुछ टूट गया था

भीतर जख्मो के कई गुच्छे हैं

गुच्छो के कई सिरे भी हैं

पर उनके जड़ो का क्या

तेरा ही दिया खाद्य  औ पानी था

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

कंही कुछ मर रहा है

कंही कुछ पल रहा है

दावानल सा हर कहीं जल रहा है

क्या तुझे नहीं दिखाई दिया है

नियति तू कब तक हाहाकार  मचाएगी

बंद करो मानवता के साथ

अपना क्रूर हास परिहास

नियति तू एक दिन पक्षताएगी

इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगा

उसी पल तू हार जाएगी

खुद से क्या फिर तू आँख मिला पायेगी

शर्म से क्या नहीं  तू  उस  दिन मर जायेगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी



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40 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
17/10/2012

फिर   कोई आया दिल -ए-जार ! नहीं कोई नहीं राह -रो होगा , कहीं और चला जाये गा ढल चुकी रात , बिखरने लगा तारों का ग़ुबार लड़खड़ाने लगे एवानों में खाव्बीदा चिराग सो गयी रास्ता तक तक के हर इक रह -गुज़र अजनबी ख़ाक ने धुन्दला दिए क़दमों के सुराघ गुल करो शम्मा ‘एं बढ़ा दो मय , मीना ओ अयाग अपने बे -ख़वाब किवाड़ों को मुक़फ्फल कर लो अब यहाँ कोई नहीं , कोई नहीं आये गा …… -फैज़

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    दिल तो चाहा पर शिकस्त -ये –दिल ने मोहलत ही न दी कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मनाजातों के बाद उन से जो कहने गए थे फैज़ जान सदका कए अनकही ही रह गयी वो बात सब बातों के बाद ……

Madan Mohan saxena के द्वारा
17/10/2012

बहुत ही सुंदर शब्दों में लिखी भाव्नामई,प्रेममई अन्तेर्मन के विस्वास को बताती हुई बेमिसाल रचना /बहुत बधाई आपको .

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय मदन मोहन जी .. नमस्कार . आपके अनमोल प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ … आप अस्भी गुणीजनों के प्रोत्साहन से बल मिलता है / सधन्यवाद

vinitashukla के द्वारा
16/10/2012

सुन्दर और प्रभावी पोस्ट पर बधाई स्वीकारें.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीया विनीता जी सादर नमस्कार सुस्वागतम … आपको कविता पसंद आई हार्दिक धन्यवाद ..

chaatak के द्वारा
16/10/2012

आपकी इस रचना को पढ़कर बरबस ही स्मरण हो आया- किस्मत के खेल निराले मोरे भैया!!! अच्छी रचना पर हार्दिक बधाई!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/10/2012

    चातक जी नमस्कार नवरात्र की शुभकामनाएं तथा सुस्वागतम .. किस्मत के खेल निराले मोरे भैया!!! सौ बात की एक बात बहुत ही सटीक प्रतिक्रिया / आपका हार्दिक आभार /

yogi sarswat के द्वारा
16/10/2012

कंही कुछ मर रहा है कंही कुछ पल रहा है दावानल सा हर कहीं जल रहा है क्या तुझे नहीं दिखाई दिया है नियति तू कब तक हाहाकार मचाएगी बंद करो मानवता के साथ अपना क्रूर हास परिहास नियति तू एक दिन पक्षताएगी इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगा उसी पल तू हार जाएगी हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहा गया है की जब जब धर्म की हानि होगी तब तब इस धरती पर भगवान् अवतरित होंगे ! किन्तु या तो भगवान् भी इस धरती पर आना नहीं चाहते या फिर अभी इतनी अति नहीं हुई की भगवान् को अपना त्रिशूल उठाना पड़े ! बहुत गंभीर विषय पर सार्थक रचना , आदरणीय महिमा श्री जी !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/10/2012

    आदरणीय योगी जी .. नमस्कार . सबसे पहले आपको नवरात्र की शुभकामनाएं / आपका बहुमूल्य प्रतिक्रिया पा के मन प्रसन्न हो गया / सही कहा आपने भगवान् भी इस धरती पर आना नहीं चाहते या फिर अभी इतनी अति नहीं हुई की भगवान् को अपना त्रिशूल उठाना पड़े” बरहाल हमें अपनी किस्मत खुद बदलने ला जज्बा रखना होगा / साधन्वाद

sudhajaiswal के द्वारा
15/10/2012

महिमा जी, बहुत ही सुन्दर रचना, सुन्दर भाव, मुझे बहुत अच्छी लगी | हार्दिक बधाई!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/10/2012

    आदरणीया सुधा जी .. सुस्वागतम .. आप समय निकाल कर आई और रचना को पसंद किया / तहे दिल से आपका बहुत-2 शुक्रिया / नवरात्र की शुभकामनाएं .. सहयोग बनाये रखे

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
15/10/2012

महिमा जी , नमस्ते ! …….कर्मनिष्ठ्ता की ताकत का अहसास कराती एक सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई !!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/10/2012

    आदरणीय आचार्य जी , सादर नमस्कार नवरात्र की शुभकामनाएं / आपके प्रोत्साहन भरे अनमोल प्रतीक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ / स्नेह बनाये रखे सादर धन्यवाद

ashishgonda के द्वारा
15/10/2012

आदरणीया! सादर, आज पहली बार आपको पढ़ रहा हूँ, बिलकुल भाव-विभोर हूँ, घुल चूका हूँ, प्रशंसा के लिए शब्द नहीं है उम्मींद है इस अल्पज्ञता को क्षमा कर देंगे.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/10/2012

    प्रिय आशीष जी . सर्वप्रथम स्वागतम . आपको रचना इतनी पसंद आई की आपको मन को छु गयी और आपको भाव विभोर कर दिया इससे बड़ी उपलब्धि किसी रचनाकार के लिए क्या होगी / आपको धन्यवाद प्रेषित करने के लिए मेरे शब्द कम पद रहे है / आशा है आगे भी आपकी सराहना मिलती रहेगी / बहुत- आभार

rekhafbd के द्वारा
15/10/2012

महिमा जी बंद करो मानवता के साथ अपना क्रूर हास परिहास नियति तू एक दिन पक्षताएगी इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगा उसी पल तू हार जाएगी,अति सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई ,आभार

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/10/2012

    आदरणीया रेखा मैम.. नमस्कार नवरात की शुभकामनाएं / आपने रचना को समय दिया और पसंद किया आपकी तहे दिल से आभारी हूँ / स्नेह बनाये रखे

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
15/10/2012

कंही कुछ मर रहा है कंही कुछ पल रहा है दावानल सा हर कहीं जल रहा है क्या तुझे नहीं दिखाई दिया है नियति तू कब तक हाहाकार मचाएगी महिमा जी नियति तो नियति ही है काश इंसान की नियति ठीक हो तो बात बने ..सुन्दर रचना .काफी वक्त के बाद पढने को मिली .. इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगा उसी पल तू हार जाएगी जागो इंसान जागो ..हम इंसान हैं पहचानो नियति को मात दो .. भ्रमर ५

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    16/10/2012

    आदरणीय भ्रमर सर , सादर नमस्कार रचना को पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद / बिलकुल सही कहा आपने / नियति को मात देना है तो जागना होगा / तभी तक़दीर बदलेगी / स्नेह बनाये रखे

alkargupta1 के द्वारा
15/10/2012

महिमा जी , अति सुन्दर भावाभिव्यक्ति

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीया अलका मैम, सादर नमस्कार आपका स्वागत है ..आपने समय दिया .. पसंद किया ह्रदय से आभारी हूँ , स्नेह बनाये रखे

ANAND PRAVIN के द्वारा
14/10/2012

आदरणीय महिमा जी , नमस्कार बहुत दिनों पश्चात आपकी सुन्दर शैली में रचित एक बहुत ही भावप्रद कविता ……… बहुत ही सुन्दर……….. किन्तु अशोक सर की बात का मैं भी समर्थन करूंगा ……..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    नमस्कार आनंद जी .. मैंने त्रुटी को दूर करने की कोशिश करी है अगर और भी कहीं दोष है तो बताएं ताकि सुधार कर सकूँ / आप मित्रो का सहयोग हमेशा से अपेच्छित है / शुरुआत से ही आपका सहयोग बना हुआ है / आशा है आगे भी मिलता रहेगा / कविता के भाव आप सब तक पहुचे लिखना सफल रहा / साभार

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
14/10/2012

बहुत सुन्दर कविता,महिमा जी. बंद करो मानवता के साथ अपना क्रूर हास परिहास नियति तू एक दिन पक्षताएगी इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगी उसी पल तू हार जाएगी बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीय राजीव सर , सादर नमस्कार आपको रचना पसंद आई आपने समय दिया इसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ / स्नेह बनाये रखे

akraktale के द्वारा
13/10/2012

महिमा जी                 सादर सुन्दर भावपूर्ण रचना पर बधाई स्वीकारें किन्तु निचे लिखी पंक्तियों में सुधार अपेक्षित है. नियति तू एक दिन पक्षताएगी इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगी

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीय अशोक सर , सादर नमस्कार .. आपका ह्रदय से धन्यवाद / अगर किसी भी रचना में वर्तनी संबधी गलती होती है तो प्रवाह में रूकावट आती है और बहुत खटकता है .. आपने बहुत ही महत्तवपूर्ण बात की और इंगित किया इसके लये आपको आभारी हूँ / आशा है आगे भी आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा /

nishamittal के द्वारा
13/10/2012

बहुत दिन बाद आपके एक सुन्दर भावपूर्ण रचना के साथ मंच पर स्वागत. भीतर जख्मो के कई गुच्छे हैं गुच्छो के कई सिरे भी हैं पर उनके जड़ो का क्या तेरा ही दिया खाद्य औ पानी था नियति तू कब तक खेल रचाएगी कंही कुछ मर रहा है कंही कुछ पल रहा है दावानल सा हर कहीं जल रहा है

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीया निशा मैम, सादर नमस्कार .. आपको कविता के भाव छू गए .. मेरा लिखना सफल हुआ / प्रोत्साहन भरे सुंदर शब्दों के लिए ह्रदय से आभारी हूँ / आशा है आगे भी आपका आशीर्वाद मिलता रहेगा / सधन्यवाद

jlsingh के द्वारा
13/10/2012

आदरणीय महिमा बहन, सादर अभिवादन! बहुत दिनों के बाद शायद फुर्सत मिली और एक सशक्त कविता लेकर उपस्थित हो गयी. हम सभी नियति का ही खेल झेल रहे हैं पता नहीं कब तक झेलना पड़ेगा!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीय जवाहर सर .. सादर नमस्कार आपका अपनत्व भाव विभोर कर देता है / अपना आशीर्वाद बनाये रखे/ सच में हम सब नियति के दास हैं पर साहस करने पर नियति भी घबडा के अपना रास्ता बदल देती है और हम अपने इच्छानुसार जिंदगी के हकदार बन जाते है / आपको कविता अच्छी लगी इसके लिए हार्दिक आभार / सधन्यवाद

Madan Mohan saxena के द्वारा
12/10/2012

आपका बहुत बहुत धन्यवाद् .पोस्ट दिल को छू गयी…….कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने……….बहुत खूब बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीय MADAN मोहन जी , नमस्कार . आपका स्वागत है .. आपने समय दिया और अपनी बेशकीमती प्रतिक्रिया दी इसके लिए तहे दिल से आपकी शुक्रगुजार हूँ / सधन्यवाद

aman kumar के द्वारा
12/10/2012

बहुत अच्छी प्रस्तुति ! समाजिक सरोकार पर चलने वाली लेखनी अब मुस्किल से ही मिलती है जी बधाई !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    नमस्कार अमन जी .. आपका स्वागत है / आपके प्रोत्साहन भरे प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ . सहयोग बनाए रखे / सधन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
12/10/2012

आदरणीय महिमा बहन ,.सादर नमस्ते कभी कुछ खोया था कंही कुछ छुट गया था कभी छन् से कुछ टूट गया था भीतर जख्मो के कई गुच्छे हैं गुच्छो के कई सिरे भी हैं पर उनके जड़ो का क्या तेरा ही दिया खाद्य औ पानी था नियति तू कब तक खेल रचाएगी……पीड़ा की अद्भुत अभिव्यक्ति ,..सादर

    shashibhushan1959 के द्वारा
    13/10/2012

    आदरणीय महिमा जी, सादर ! मन की पीड़ा शब्दों में उतर आई है ! बहुत सुन्दर !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीय संतोष भाई जी .. नमस्कार .. आपको कविता अच्छी लगी / लिखना सार्थक हुआ / आपकी प्रतिक्रिया भी सबसे पहले आई इसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ /

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    15/10/2012

    आदरणीय शशि सर , सादर नमस्कार , आप जैसे विद्वानों से सराहना मिलती है तो अच्छा लिखने का उत्साह बढ़ जाता है / आशीर्वाद बनाए रखे / आपका ह्रदय से धन्यवाद .. साभार


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