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नवरात्र और नारी शक्ति ..

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या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

सर्वप्रथम आप सभी सुधीजनों को नवरात्र की शुभकामनाए..

बहुत दिनों से मेरे मन में  कुछ बातें चल रही थी आज आप सबके साथ  बाटना चाहती हूँ / कोई नई बात मैं नहीं कहने जा रही पर जब तक इन
बातो का सही अर्थ में स्थान नही मिल जाता ये उठती रहेंगी/

अभी हाल में ही मुझे एक छोटी सी काव्य गोष्टी में भाग लेने का अवसर मिला / जहाँ १५-२० लोग उपस्थित थे /इनमें ज्यादातर पत्रकार बंधू थे और ४ -५ कविगण थे जिनमे से एक मैं भी थी /

संचालक महोदय जिनसे भी हाल ही में मित्रता हुई है  मुझे उन्होंने नारी शक्ति कह के कुछ जयादा ही जोर दे के  स्वागत किया / उस वक्त मैंने कुछ भी नहीं सोचा /

एक बात बताती चलू जिन महोदय ने ये काव्य गोष्ठी रखी थी उनका जन्म दिवस था और वो एक छोटे से समाचार पत्र के उपसंपादक भी है उसकी भी नौवी वर्षगाठ थी / बरहाल कार्यक्रम शुरू हुआ / अब मुझे समझ में आ रहा था वो काव्य गोष्ठी नहीं गुणगान गोष्ठी थी / जिन्हें भी मंच पे बुलाया जाता वो उपसंपादक महोदय का गुणगान करता / कविता पाठ अभी तक किसी ने नहीं किया / जिनकी वर्षगाठ थी उनसे भी इधर ही जान पहचान हुई थी इसलिए अभी तक मैंने उनकी कोई भी साहित्तिक कृति पढ़ी नहीं थी न ही जानकारी ही थी .. कैसा लिखते हैं , क्या लिखते हैं / बस उनके मित्र जो भी आके गुणगान करते उसी के अनुरूप अपने दो शब्द तैयार कर लिया था मैंने बधाई देने के लिए / और अपने कवितायेँ पाठ करने के लिए तो ले के गयी ही थी बड़े अरमान से /

इसी बीच संचालक महोदय के मुंह से कई बार नारी शक्ति -२ सुन रही थी / बार -२ नारी शक्ति का सम्बोधन सुनकर पहले मुझे हास्य बोध हुआ और बाद में मैं मन ही मन खिन्न होने लगी  क्योंकि जिस तरह का वातावरण था वहा ये शब्द अपनी गरिमा खो रहा था / और वैसे भी मैं वहा अपने आपको एक कवी की तरह ही देख रही थी न की स्त्री या पुरुष की तरह चूँकि अकेली नारी वंहा मैं उपस्थित हूँ इसका वो मुझे बार -२ ज्ञान करवा रहे थे  / और  हर एक गजल या शायरी के बाद संचालक महोदय नारी शक्ति -२ करने लग जाते जो अब असहय होने लगा और व्यंग सा लगने लगा  इधर एक और पत्रकार महोदय ने इस शब्द को पकड़ा और जब उनकी बारी आई तो उन्होंने इस विषय पे ही गंभीरता से अपनी बात रखी / मुझे थोड़ी राहत मिली / पर मेरा दिमाग तो घूम चूका था मैं बैठे -२ मन ही मन में संचालक महोदय से लड़ रही थी क्यूँ हम हमेशा  इंसान को इंसान ना समझ  के उसे धर्म -जाती था स्त्री- पुरूष के भेद की सीमा में बांध देते हैं /

आज से जब दुर्गा के रूप में नौ दिन शक्ति की आराधना शुरू हो गयी है / तो क्या इन दिनों देश  में कन्या भ्रूण हत्या रुक जायेगी / या कन्या के जन्म लेने पे वाकई में प्रसंता व्यक्त करेंगे . या ये सिर्फ मुंह से ही कहेगे मेरे घर दुर्गा आई, लक्ष्मी आई और मन ही मन माता रानी से रोष भी रखेंगे / इसमें दो राय नहीं है , गरीबी , दहेज़ का भय , कंही पिछड़ी मानसिकता आदि के कारण कई जघन्य अपराध हो रहे है और इन घरो में माँ दुर्गा की आराधना भी की जा रही होगी / वही कंही बलात्कार भी हो रहे होगे / और हमारे नेतागण अपनी असम्वेदनशील ब्यान भी देते रहेगे / जो अपनी पत्नी अपनी बेटियों को सम्मान नहीं दे सकता वो क्या हकदार है इस अराधना का / क्यूँ इनको दिखावा करने को छुट मिली हुई है /

ये कैसा विरोधाभास है इस भारत भूमि का / क्यों पूजा के लिए स्त्री को प्रतिस्थापित किया और बड़े -२ गुणगान किये गए है / जबकि करनी में तो कुछ और ही दीखता है /

स्त्री पहले एक इंसान है उसे इंसान का दर्जा तो पहले  सही तरीके से दो / उसे जीने तो दो / उसे समूल नस्ट कर और फिर  मूर्तियाँ स्थापित करने का कुचक्र बंद करो /
बंद करो महिमामंडन का ढोग / उसे बस समाज का हिस्सा बन ने दो / आसमान पे बिठाने का स्वांग बंद करो / नारी को सिर्फ नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेंगी /

ये सारी बातें  मेरे दिमाग में कूद फांद ही रही थी की संचालक महोदय का फिर से जोर से आवाज आई और फिर से वही  नारी शक्ति वाली टेक और मुझे मंच पे बुलाया / मैंने मैं अपने कविता  सुनाई जिसमे किसी को रूचि नहीं दिखी सभी गप्पे मारने में मशगुल थे / कार्यक्रम समाप्त हुआ /

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52 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mayankkumar के द्वारा
01/12/2012

आपका लेख वाकई पढ़ कर कृतज्ञ हुआ ………….. सधन्यवाद .. !

Sushma Gupta के द्वारा
12/11/2012

महिमा जी,आज के समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर करके उसपर एक विचारणीय सोच को जन्म देने बाला आपका आलेख बहुत महत्वपूर्ण है. दीपाबली की समस्त हार्दिक शुभ-कामनाओं सहित.. सुषमा गुप्ता

satish3840 के द्वारा
03/11/2012

बहुत खूब महीमा जी आदमी की कथनी और करनी में बड़ा ही अंतर हें एक और देवी की पूजा करता हें दूसरी और घर की देवी को उचित सम्मान शायद ही देता हो आज के भोतिक युग में किसी भी शकित की पूजा उसके बदले मिलने वाले लाभ से आंकी जाती हें

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    03/11/2012

    आदरणीय सतीश सर , नमस्कार सर्वप्रथम स्वागत है आपका .. आपने अपने प्रतिक्रिया द्वारा मेरे विचारो का समर्थन किया .. आभारी हूँ .. सही कहा आपने जिस चीज इंसान को लाभ मिलता है उसे करने के लिए एडी छोटी लगा देता है ….. और नारी की अवहेलना में कंही न कंही ये मानसिकता भी काम करती है …वो बराबर अधिकारनी होगी .. तो उन्हें हानि होगी ….. आपका बहुत -२ धन्यवाद

Madan Mohan saxena के द्वारा
29/10/2012

बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना.बहुत बधाई आपको . मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद . सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला -

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    03/11/2012

    आदरणीय मदन जी ..नमस्कार आपका बहुत -२ धन्यवाद आपने आपना कीमती समय निकाल कर .. इतनी सुंदर प्रतिक्रिया दी .. आपके समर्थन के लिए आभारी हूँ

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
28/10/2012

स्त्री पहले एक इंसान है उसे इंसान का दर्जा तो पहले सही तरीके से दो / उसे जीने तो दो / उसे समूल नष्ट कर और फिर मूर्तियाँ स्थापित करने का कुचक्र बंद करो / बंद करो महिमामंडन का ढोग / उसे बस समाज का हिस्सा बन ने दो / आसमान पे बिठाने का स्वांग बंद करो / नारी को सिर्फ नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेंगी / महिमा जी सुन्दर वचन आप के ..कहते हैं न की कथनी और करनी में अंतर होता है काश इसे लोग समझें केवल बातों से कोरी कल्पना के उड़ान से ही दुनिया न सुधारें तो अच्छा हो ..सब शुभ हो मंगलमय हो आत्म शुद्धि हो आत्म अवलोकन हो स्त्रियों को भरपूर सम्मान मिले तो आनंद और आये भ्रमर ५

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    03/11/2012

    आदरणीय भ्रमर सर .. सादर नमस्कार आपने सही कहा यंहा कथनी और और करनी में बहुत अंतर है विशेष कर नारियों के मामले …. “सब शुभ हो मंगलमय हो आत्म शुद्धि हो आत्म अवलोकन हो स्त्रियों को भरपूर सम्मान मिले तो आनंद और आये ईश्वर से प्रार्थना है आपके जैसे ही सकरात्मक विचार सभी में आये और परिवर्तन हो …. आपका हार्दिक धन्यवाद .. आभारी हूँ

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
23/10/2012

महिमा जी, साभिवादन !……. आप ने बहुत कुछ कह दिया इस लघु कवि-गोष्ठी की ब्याज से ! बस्तुतः आज की यही त्रासदी है ! कहने के लिए तो बहुत कुछ है पर ऐसा मुझे लगता है कि मैं जो कहूंगा , सब आप जानती होंगी ! पुनश्च !!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    03/11/2012

    आदरनीय आचार्य जी . सादर नमस्कार .. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया ने मेरे मतंवय को बल दिया .. आप अवस्य कहे .. जाने और सिखने की तो अभी शुरुआत है … आपका हार्दिक आभारी हूँ .सादर

manoranjanthakur के द्वारा
23/10/2012

बहुत बधाई …. स्वागत

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    03/11/2012

    आपका स्वागत है मनोरंजन जी … आपने समय निकला बहुत-२ धन्यवाद ..आभारी हूँ

nishamittal के द्वारा
19/10/2012

आपने एक यथार्थ को शेयर किया है,महिमा वैसे नेतागण अपने गुणगान और महिमा मंडन के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित कृते हैं.संतलाल जी के विचार से मैं सहमत हूँ.जागरण और ऐसे ही अन्य मंच आपको अपनी प्रतिभा निखारने का पूर्ण अवसर प्रदान कर सकते हैं.

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    19/10/2012

    आदरणीया निशा मैम सादर नमस्कार आपने समय निकाल कर इस पोस्ट को पढ़ा और अपने विचार दिए उसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ … आपसे मैं सहमत हूँ आदरणीया जागरण तथा इसके जैसे अन्य मंच प्रतिभा निखारने का पूर्ण अवसर प्रदान करते है .. भविष्य में मैं पुर्णतः इस प्रकार के आयोजन से दुरी ही रखूंगी .. साभार

Santlal Karun के द्वारा
19/10/2012

आदरणीय महिमा जी , आप हमारी बहन-बेटी हैं, इसलिए मेरी सलाह है कि मानहीन उलूल-जुलूल मंच पर कविता-पाठ का लोभ त्याग दीजिए | एक नारी-शक्ति कवयित्री को उ.प्र. के एक विधायक ने इतना नारी-शक्ति बनाया कि उसकी निर्मम हत्या के अंत पर भी कथा समाप्त नहीं हुई | घटना राज्य और देश और मीडिया में काफी चर्चित रही है तथा कथित विधायक पत्नी सहित जेल की हवा खा रहे हैं | हमारे यहाँ दिनकर और बच्चन- जैसे मंचीय कवि दूसरे नहीं हुए | विशेष यह कि वे दोनों साहित्य में भी चोटी पर स्थापित हुए | परन्तु ऐसे भी कवि हुए हैं, जो कविता की मंचीय प्रस्तुति पसन्द नहीं करते थे और युगीन उच्च पदा रचना देने में समर्थ रहे; जैसे कि प्रसाद और उनकी कामायनी | अतएव मंच पर जाने, न जाने से फ़र्क नहीं पडता और उसका निर्णय निश्चित ही सजगता और सावधानी की अपेक्षा रखता है; वह भी तब, जबकि आज-कल के अधिकतर मंच लबरों द्वारा आयोजित तथा उनकी ही शोभा से शोभित होते हैं | आप के इस नवरात्रीय तंतुओं से आवेष्टित नारी-प्रश्न-आलेख पर हार्दिक साधुवाद व नवरात्रि की शुभ कामनाएँ !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    19/10/2012

    आदरणीय संतलाल जी .. सादर नमस्कार आपका स्वागत है .. आपके अपनत्व भरे ,, वैचारीक सलाह के लिए अनुग्रहित हूँ .. मैंने उसी दिन निर्णय ले लिया .. अब ऐसे हलके मंच पे काव्य पाठ नहीं कंरने जायुंगी और बस लिखूंगी और जागरण तथा एनी ऑनलाइन ब्लोग्स पे ही सक्रिय रहूंगी ./ मेरे पिता जी ने जब सारा वृत्तांत सुना तो उन्होंने उसी वक्त कहा बहुत हल्का मंच है अब आगे मत जाना … .. आपको ह्रदय से बधाई … आपने वीस्तरित तरीके से मुझे रास्ता दिखाया और प्रोत्साहित किया

Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
19/10/2012

आदरणीय महिमा जी, सौ फीसदी सत्य यही है की हमारा समाज नारी को पुरुष की बराबरी के काबिल ही नहीं समझता, इसीलिए जब भी कोई स्त्री घर की चारदीवारी से निकलकर कोई काम करती है, तो उसे आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाने लगता है! जब इन्हें वाकई बराबर समझा जाएगा तो इस आश्चर्य की समाप्ति स्वयं हो जायेगी! एक प्रभावशाली एवं विचारणीय लेख नारी के अधिकारों को आवाज़ देते मेरे इस लेख पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार है http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/10/18/hariyaana-aur-chautaala/

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    19/10/2012

    समीर जी नमस्कार आपका बहुत-२ हार्दिक धन्यवाद सौ फीसदी सत्य यही है की हमारा समाज नारी को पुरुष की बराबरी के काबिल ही नहीं समझता, इसीलिए जब भी कोई स्त्री घर की चारदीवारी से निकलकर कोई काम करती है, तो उसे आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाने लगता है! जब इन्हें वाकई बराबर समझा जाएगा तो इस आश्चर्य की समाप्ति स्वयं हो जायेगी! आपसे बिलकुल सहमत हूँ .. बिलुल सत्य कहा आपने …. अवस्य आपका आलेख पढूंगी …

ANAND PRAVIN के द्वारा
18/10/2012

आदरणीय महिमा जी, नमस्कार आपकी बातों को पढ़ माफ़ कीजिएगा मुझे भी हंशी आ गई……….वास्तव में आपने अपनी जो मनोस्तिथि वहां के बारे में बताई उसी को सोच सोच वास्तव में कविता कहने या बहुत सुन्दर और सजीले ढंग से कहने से ही किसी के अच्छे या बुरे होने की बात समझ में नहीं आती ……..आती है तो बस उसके अन्दर छुपे भावों से जो की कितनी गहराई के साथ कही गई है इसे बतलानी चाहिए………आपको खेद के साथ कहना चाहूँगा की आपने एक अच्छा मौक़ा गवा दिया वास्तविक नारी शक्ति को दर्शाने का……………किस बात की नारी कैसी नारी…………ये समझाने का……अगर आपको बिना कुछ कहे ही एक विशेष संबोधन दिया गया वो भी प्राकृतिक तथ्यों पर तो उन लोगों को जो वहां मौजूद थे एक करारा जवाब तथा जन्मदिवस की एक तोहफा भी मिलना चाहिए था ताकि वो समझ सकें की शब्दों का असली महत्व क्या होता है…………..शायद आप मेरी बातों को न समझ पायें क्यूंकि यह बहुत लम्बी बात है…………….कुछ गलत लगे तो माफ़ी चाहूँगा………..नवरात्री की परिवार सहित शुभकामनाएं

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    19/10/2012

    आनंद जी आपकी बातो को मैं समझ रही हूँ / मैं वंहा नारी शक्ति पे एक जोरदार भाषण और आज के बलात्कार भूर्ण हत्या ..नेताओ द्वारा असम्वेदनशील वक्तव्यों पे जोरदार बोल सकती थी …. और ऐसे कई मौके आये है मैंने किये है पर मैं वंहा का अवलोकन कर रही थी मैं लोगो को तौल रही थी की की भविष्य में यंहा आया जाए या नहीं …. और मैंने अपनी बेस्ट कवितायेँ सुना कर नारी प्रतिभा का प्रदर्शन ही तो किया . जरुरी तो नहीं है हर बार हम रोष में और जोश में आकर चीजो को बार दोहराते रहे … बल्कि जरुरी ये है की अपनी प्रतिभा से अपना स्थान स्वयं बना कर अपनी ताकत का एहसास कराए … ताकि अन्य महिलाए भी सबल होने के लिये प्रेरित हो .. और ये माफ़ी वाफी शब्द नहीं लिखा कीजिये …. खुल के विचारों का आदान प्रदान के लिए ही तो हम यंहा है …

alkargupta1 के द्वारा
18/10/2012

महिमा जी , आपने अपने मानसिक उद्वेलन को बड़ी ही सुन्दरता के साथ प्रस्तुत किया है ….नारी को नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेगी ….. विचारणीय आलेख की प्रस्तुति पर साधुवाद

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    19/10/2012

    आदरणीया अलका मैम.. सादर नमस्कार आपका ह्रदय से धन्यवाद / आपने इस पोस्ट को समय दिया और और भाव पक्ष को बल दिया इसके लिए आभारी हूँ

rekhafbd के द्वारा
18/10/2012

महिमा जी नारी को सिर्फ नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेंगी /,अति सुंदर प्रस्तुति,हार्दिक बधाई

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    19/10/2012

    आदरणीया रेखा मैम नमस्कार सराहने के लिए आपका ह्रदय से धन्यवाद .

18/10/2012

महिमा जी बहुत सुंदर ढंग से आज के समाज में नारी की स्थिति और नारी शशक्तिकरण की दुर्दशा पर आपका ये व्यंग्य लेख । बहुत अच्छा लगा। आपको बहुत बहुत बधाई। साथ में दुर्गा पूजा की शुभकामनायें! 

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय डॉ साहब .. नमस्कार आपके शब्दों ने मेरी लेखनी और विचारो को मान दिया इसके लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ …. आपको भी दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं

बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये आभार ,,,,,,

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय डॉ हिमांशु जी , नमस्कार पहले तो स्वागत है आपका .. मेरे ब्लॉग पे आपकी प्रथम उपथिति है… आपका हार्दिक आभार

shashibhushan1959 के द्वारा
18/10/2012

आदरणीय महिमा जी, सादर ! बड़े खट्टे और कडवे अनुभव हुए आपको ! दुर्भाग्य से ये अंतर समाप्त नहीं बल्कि बढ़ रहे हैं ! क्यों ? यह विचार का विषय है ! सादर !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय शशि सर .सादर नमस्कार .. इस अंतर को समाप्त करने के लिए आप विद्वानों को समाज में फिर से चेतना जगाने का भार उठाना होगा …. आपक भाहूत -२ धन्यवाद / साभार

seemakanwal के द्वारा
17/10/2012

आप का लेख पढ़कर मुझे भी अपने स्मरण यद् आ गये वो भी कुछ इसी तरह के थे .

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीया सीमा जी . सादर नमस्कार .. सर्वप्रथम आपका सुस्वागतम …. आपका बहुत -२ धन्यवाद आपने समय दिया .. साभार

अजय यादव के द्वारा
17/10/2012

आदरणीय महिमा जी, सादर प्रणाम ….. यह बड़ी बिडम्बना और ग्लानि का विषय है कि , हम भारतीय , महिलाओं के प्रति इतना सम्मान , आदर और श्रद्धा रखते हैं , साल में दो बार देवी के पर्व मनाते हैं पर इसका प्रभाव वह नहीं है जो हम पर्वों , चित्रों , मंदिरों , यज्ञों , जागरणों में ब्यक्त , प्रदर्शित करते हैं ….देवी जो नारी कि प्रतिदेवी हैं , उनके प्रति हमारा रोज-ब रोज का रवैया , बहुत दुखद , खेदजनक और घृणास्पद है , जो कहता है – हम सभी तो नहीं पर अतिअधिक मनसा -वाचा-कर्मणा एक नहीं हैं ….इसपर हमे सोचना चाहिए और नारी के प्रति , समानता , श्रद्धा , सम्मान , ब्यवहार में लाना चाहिए , ( इसका अर्थ नर -नारी में परस्पर , स्नेह , प्रेम , संपर्क , सम्बन्ध , प्रेम , मित्रता का निषेध नहीं है , समानता -आदर की दरकार है ) ….आज समाज में जो नारी का शोषण हर स्तर पर दृश्यमान है , वह हमारी भारतीय संस्कृति , सभ्यता और सोच पर एक बदनुमा दाग है ……एक देवी की फोटो लगा कर , जागरण कर और पैदल पहाड़ों पर चढ़ कर देवी की पूजा अर्चना और व्रत -पूजा करके जय देवी कहने से , भला होने की प्रवृत्ति पर विचार करने की जरूरत है ……भक्त , देवता -देवी , मंदिर -संयासी सभी को पुनर- प्राण -प्रतिष्ठा की जरूरत है ……पत्थर की देवी की पूजा , दया , की मांग और जीवित देवी का नाना-प्रकार से शोषण , क्या यह हमारा दोहरा चरित्र नहीं है ? ******************************************************************************. स्त्री को देवी समान दर्जा देने वाले भारत देश की महिलाओं ने अपने प्रयासों, अपने कार्यों और अपने लक्ष्यों के बल पर दुनियाभर में सम्मान और वही देवी का दर्जा हासिल किया है। राजनीति, उद्योग, समाजसेवा, खेल या फिर फिल्मों की ही बात क्यों न हो, भारतीय महिलाओं ने हर जगह अपनी मेहनत के बल पर पुरुष प्रधान समाज में अपनी सशक्त दावेदारी प्रस्तुत की है। पेश है एक सूची: 1828-1858 : झाँसी की रानी रानी लक्ष्मीबाई की वजह से ही 1857 में झाँसी सेनानियों का केंद्र बना। अँगरेजों के खिलाफ जमकर आग उगली थी। 1725-1795 : देवी अहिल्याबाई मालवा की राजमाता रहीं। बिना मदद के राजपाठ चलाया। न्यायप्रिय अहिल्यादेवी ने बेटे तक को मृत्युदंड दिया। 1919-1984 : इंदिरा गाँधी भारत की लौह महिला। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री। पाक को धूल चटाई, बांग्लादेश आजाद कराया। आपातकाल लगाया। 1869-1944 : कस्तूरबा गाँधी महात्मा गाँधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलीं। गिरफ्तार भी हुईं। बा भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय रहीं। 1919-2005 : अमृता प्रीतम पहली पंजाबी महिला लेखक और कवयित्री। 16 साल की उम्र में पहला संकलन आया। उनके उपन्यास पिंजर पर फिल्म भी बनी। 1910-1997 : मदर टेरेसा मानव सेवा पर ही जीवन निकाला। कच्ची उम्र में ही सेवा शुरू की। कुष्ठरोग से लड़ते हुए उनको नोबल पुरस्कार मिला। 1879-1949: सरोजिनी नायडू भारत की कोकिला के नाम से जानी जाती थीं। कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। आजादी की लड़ाई में गाँधीजी की साथी। 1964 : पीटी उषा ख्यात एथलीट। गरीब परिवार से उठकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम जमाया। पद्मश्री और अर्जुन पुरस्कार पा चुकी हैं। 1961-2003 : कल्पना चावला भारत में जन्मी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री थीं। वे 1995 में नासा से जुड़ीं। नासा में उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। 1965 : सुनीता विलियम भारत की दूसरी महिला, जिसे नासा ने अपने अंतरिक्ष अभियान के लिए चुना। उनके नाम अंतरिक्ष में चलने का रेकार्ड है। 1971 : किरण देसाई भारतीय मूल की लेखिका किरण देसाई ने अपने नॉवेल ‘द इनहेरिटेंस ऑफ लॉस’ के लिए वर्ष 2006 का बुकर पुरस्कार जीता। 1958 : इंदिरा नूई फोर्ब्स पत्रिका ने इंदिरा नूई को दुनिया की 100 शक्तिशाली महिलाओं में चौथा स्थान दिया। ये पेप्सीको की एक्जीक्यूटिव चेयरपर्सन हैं। 1907-1987 : महादेवी वर्मा ख्यात हिन्दी कवयित्री। उन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है। छायावाद पर कार्य किया। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1929 : लता मंगेशकर दुनिया की सबसे श्रेष्ठ गायिका। देश- विदेश में कई पुरस्कार मिले हैं। कई बार फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार। 1940 : सोनल मानसिंह देश की ख्यात ओडिसी नर्तकी। सबसे कम उम्र में इन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। 1954 : मेधा पाटकर सामाजिक कार्यकर्ता। नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रणेता।

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    प्रिय अजय जी , नमस्कार .. पहले तो आपके इस बहुमूल्य आलेख रूपी प्रतिक्रया के लिए कोटिश: धन्यवाद … आपसे अनुरोध है इसे आप एक स्वतंत्र आलेख के रूप में भी पोस्ट कर दे .. क्योंकि आपने बहुत ही उम्दा लिखा और नीचे जो वीररांगनाओ की सूची डाली है वो अतुलनीय है … आपकी भावनाए भी इसमें सम्माहित है जिससे ये और भी महतवपूर्ण हो गया है .. आपसे बिलकुल सहमत हूँ आज भारतीय समाज में एक सा मनसा -वाचा-कर्मणा का आभाव है आयर यही मानसिक पतन का कारण भी है … आपका बहुत-२ धन्यवाद .

Madan Mohan saxena के द्वारा
17/10/2012

वाह बहुत खूबसूरत अहसास हर लफ्ज़ में आपने भावों की बहुत गहरी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है… बधाई आपको… सादर वन्दे…

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय मदन मोहन जी .. सादर वन्दे … आपके खुबसूरत प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से बधाई …

yogi sarswat के द्वारा
17/10/2012

ये कैसा विरोधाभास है इस भारत भूमि का / क्यों पूजा के लिए स्त्री को प्रतिस्थापित किया और बड़े -२ गुणगान किये गए है / जबकि करनी में तो कुछ और ही दीखता है / मैं नहीं समझ पाता इस विडम्बना को ! हम जिस नारी की पूजा करते हैं उसी का मान मर्दन करने में कोई कसार नहीं छोड़ते ! बहुत सही लिखा आपने

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय योगी जी , नमस्कार .. आपने मेरे विचारों को अपना समर्थन दिया … और इस समस्या को आवाज दी … आपका बहुत धन्यवाद

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
16/10/2012

महिमा जी आप सपरिवार को भी नव रात्री की हार्दिक शुभ कामनाएं .. बहुत सुन्दर लेख ..जिस समाज में नारियों का सम्मान नहीं हुआ वो पतन की तरफ ही जाता है …काश लोग जागें सोचें मान और सम्मान दें शक्ति को … भ्रमर ५

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय भ्रमर सर .. नमस्कार ….. बिलकुल सही कहा आपने “”.जिस समाज में नारियों का सम्मान नहीं हुआ वो पतन की तरफ ही जाता है …काश लोग जागें सोचें मान और सम्मान दें शक्ति को “”… हमारे पूर्वजो ने भी यही बात समाज में बहुत ही पहले समझा दी … पर देखिये … आज के नेता ही जब भर्स्ट आचरण को उतारू है तो जनता को क्या सन्देश जायेगा … आपका ह्रदय से धन्यवाद

akraktale के द्वारा
16/10/2012

महिमा जी             सादर, बहुत सच्चे मन से आपने जों बात रखी है वह बहुत ही ह्रदयस्पर्शी है.आजकल यह चलन देखने को मिलता है कि जन्मदिन जैसे अवसर पर ऐसे आयोजन सिर्फ अपने गुणगान करवाने के लिए ही आयोजित किये जाते हैं जिसे फिर दूसरे दिन अखबार में प्रकाशित कर अपनी महानता से पाठकों को अवगत कराया जाता है. आपने सही कहा है स्त्री पहले एक इंसान है उसे इंसान का दर्जा तो पहले सही तरीके से दो / उसे जीने तो दो / उसे समूल नस्ट कर और फिर मूर्तियाँ स्थापित करने का कुचक्र बंद करो / बंद करो महिमामंडन का ढोग / उसे बस समाज का हिस्सा बन ने दो / आसमान पे बिठाने का स्वांग बंद करो / नारी को सिर्फ नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेंगी / सुन्दर और सच्चे आलेख के लिए बधाई स्वीकारें.

    jlsingh के द्वारा
    17/10/2012

    बिलकुल सही …. कहा, अशोक भाई जी ने ! नवरात्रि की शुभकामनायें! माँ दुर्गे हम सबका कल्याण करें!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय अशोक सर .. नमस्कार .. बिलकुल सही कहा आपने .. वो काव्य गोष्ठी तो एक बहाना था … मैंने जानबूझ कर वो वाला प्रसंग नहीं डाला … जादातर टाइम बस फोटोशेसन ही होता रहा … यंहा तक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी .. जबरदस्ती फोटो के लिए रोके रखा गया ताकि आछे फोटो अखबार में डाले जाए … मेरे लिए ये पहला अनुभव था …और मैं चकित थी .. ये अलग बात है मैंने वंहा कुछ भी जाहिर होने नहीं दिया ….. और एक बात यही भी अनुभव किया रिपोर्टिंग करना और साहित्य सृजन दोनों अलग चीजे है .. डेली न्यूज़ का रिपोर्टर या कहे पत्रकार साहित्य का समझ रखता हो ये जरुरी नहीं है ….क्योंकि ज्यादातर उन्ही से वास्ता पड़े मुझे उस दिन …. आपने आलेख को अपना सर्थन दिया और शब्द दिए … आपका ह्रदय से आभारी हूँ ……धन्यवाद आपका

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय जवाहर सर ..नमस्कार आपका बहुत-२ धन्यवाद …. जय माता दी ..

aman kumar के द्वारा
16/10/2012

आपका कहना बिलकुल ठीक है ! नारी को बस … नारी रहेने दो ………. अच्छे लेख की बधाई !

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    नमस्कार अमन जी …. नवरात्र की शुभकामनायें … आपने आलेख के मर्म को समर्थन दिया उसके लिए बहुत-२ धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
16/10/2012

ये कैसा विरोधाभास है इस भारत भूमि का / क्यों पूजा के लिए स्त्री को प्रतिस्थापित किया और बड़े -२ गुणगान किये गए है / जबकि करनी में तो कुछ और ही दीखता है / स्त्री पहले एक इंसान है उसे इंसान का दर्जा तो पहले सही तरीके से दो / उसे जीने तो दो / उसे समूल नस्ट कर और फिर मूर्तियाँ स्थापित करने का कुचक्र बंद करो / बंद करो महिमामंडन का ढोग / उसे बस समाज का हिस्सा बन ने दो / आसमान पे बिठाने का स्वांग बंद करो / नारी को सिर्फ नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेंगी / आदिकाल से नारी स्वयं है पहचान निज कारन से अबला कह स्वयं बने बलवान नारी कई रूपों men संस्कार जगाती और न सही माता तो कहलाती आपकी व्यथा है सच्ची katha धन्य आप जो सबे सुने इसी बात पे देता हूँ आपको बधाई. स्नेही महिमा जी, सादर

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय सर , सादर प्रणाम .. आदिकाल से नारी स्वयं है पहचान निज कारन से अबला कह स्वयं बने बलवान नारी कई रूपों men संस्कार जगाती और न सही माता तो कहलाती… आपसे शब्दशः सहमत हूँ .और आपके सकरात्मक दृष्टिकोण के आगे नतमस्तक .. यूँही विस्वास जगाते रहिये ….सादर …

sudhajaiswal के द्वारा
16/10/2012

महिमा जी, बहुत अच्छा आलेख, कड़वी सच्चाई को सामने लाने के लिए बधाई और धन्यवाद भी |

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीया सुधा जी .नमस्कार आपको भी बहुत -२ धन्यवाद .. आपने वक्त दिया और सराहा … आभारी हूँ

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
16/10/2012

महिमा जी बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ,जय माता दी ,

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    18/10/2012

    आदरणीय अनुराग सर .नमस्कार जय माता दी ….. आपको हार्दिक धन्यवाद


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