AKULAHTE...MERE MAN KI

bhavnaow ki abhivayakti ka ........ak aur khula darwaja

25 Posts

702 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8762 postid : 625279

परम्परा की थाती ...

Posted On: 13 Oct, 2013 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

नवरात्री आ गई

सोच रही हूँ माँ तुम्हें

गंगा स्नान के बाद

आज भी लगाती हो तुम आलता

पायल सजे पैरो में

देवी पूजन से पहले

सजती हो देर तक

फिर तैयार करती हो पूजन सामग्री

भोग के लिए खीर , पुए , चूरन , चरणामृत

फल , फूल

हवन समाग्री की लिस्ट को

एक बार मिलाती

कहीं कुछ छुट तो नहीं गया

सजाती हो रंगोली

हल्दी , चावल और कुमकुम से

फिर कलश स्थापना करती हो

माँ दुर्गा की सजी तस्वीर

बैठा चुकी होती हो चौकी पर

गंगा जल अंजुरी भर कर

ओउम पवित्रो पवित्र: का सस्वर पाठ  कर

सबके कल्याण के लिए कर जोड़

शुरू करती हो दुर्गासप्तशती

साथ में जलता है नौ दिन अखंड  दिया

माँ  जानती हो

इनदिनों  मेरे लिए तुम

साक्षात् देवी हो जाती हो

मैं  तुम्हें अपलक निहारा करती हूँ

परम्परा की ये थाती

मैं भी संभालुंगी एक दिन

जानती हूँ

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
13/10/2013

गंगा जल अंजुरी भर कर ओउम पवित्रो पवित्र: का सस्वर पाठ कर सबके कल्याण के लिए कर जोड़ शुरू करती हो दुर्गासप्तशती साथ में जलता है नौ दिन अखंड दिया माँ जानती हो इनदिनों मेरे लिए तुम साक्षात् देवी हो जाती हो मैं तुम्हें अपलक निहारा करती हूँ परम्परा की ये थाती मैं भी संभालुंगी एक दिन जानती हूँ मेरी प्यारी बहन महिमा, माँ की थाती को बेटी ही सम्हालती है वह तो एक साथ दो घर सम्हालती है बेटी और बहु बनकर!


topic of the week



latest from jagran