AKULAHTE...MERE MAN KI

bhavnaow ki abhivayakti ka ........ak aur khula darwaja

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MAHIMA SHREE


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परम्परा की थाती …

Posted On: 13 Oct, 2013  
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कविता में

1 Comment

वो गाँव कहाँ है …..

Posted On: 28 May, 2012  
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Others में

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नदी सी मैं …

Posted On: 14 Apr, 2012  
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में

52 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

आदरणीय महिमा जी , आप हमारी बहन-बेटी हैं, इसलिए मेरी सलाह है कि मानहीन उलूल-जुलूल मंच पर कविता-पाठ का लोभ त्याग दीजिए | एक नारी-शक्ति कवयित्री को उ.प्र. के एक विधायक ने इतना नारी-शक्ति बनाया कि उसकी निर्मम हत्या के अंत पर भी कथा समाप्त नहीं हुई | घटना राज्य और देश और मीडिया में काफी चर्चित रही है तथा कथित विधायक पत्नी सहित जेल की हवा खा रहे हैं | हमारे यहाँ दिनकर और बच्चन- जैसे मंचीय कवि दूसरे नहीं हुए | विशेष यह कि वे दोनों साहित्य में भी चोटी पर स्थापित हुए | परन्तु ऐसे भी कवि हुए हैं, जो कविता की मंचीय प्रस्तुति पसन्द नहीं करते थे और युगीन उच्च पदा रचना देने में समर्थ रहे; जैसे कि प्रसाद और उनकी कामायनी | अतएव मंच पर जाने, न जाने से फ़र्क नहीं पडता और उसका निर्णय निश्चित ही सजगता और सावधानी की अपेक्षा रखता है; वह भी तब, जबकि आज-कल के अधिकतर मंच लबरों द्वारा आयोजित तथा उनकी ही शोभा से शोभित होते हैं | आप के इस नवरात्रीय तंतुओं से आवेष्टित नारी-प्रश्न-आलेख पर हार्दिक साधुवाद व नवरात्रि की शुभ कामनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आनंद जी आपकी बातो को मैं समझ रही हूँ / मैं वंहा नारी शक्ति पे एक जोरदार भाषण और आज के बलात्कार भूर्ण हत्या ..नेताओ द्वारा असम्वेदनशील वक्तव्यों पे जोरदार बोल सकती थी .... और ऐसे कई मौके आये है मैंने किये है पर मैं वंहा का अवलोकन कर रही थी मैं लोगो को तौल रही थी की की भविष्य में यंहा आया जाए या नहीं .... और मैंने अपनी बेस्ट कवितायेँ सुना कर नारी प्रतिभा का प्रदर्शन ही तो किया . जरुरी तो नहीं है हर बार हम रोष में और जोश में आकर चीजो को बार दोहराते रहे ... बल्कि जरुरी ये है की अपनी प्रतिभा से अपना स्थान स्वयं बना कर अपनी ताकत का एहसास कराए ... ताकि अन्य महिलाए भी सबल होने के लिये प्रेरित हो .. और ये माफ़ी वाफी शब्द नहीं लिखा कीजिये .... खुल के विचारों का आदान प्रदान के लिए ही तो हम यंहा है ...

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

आदरणीय महिमा जी, नमस्कार आपकी बातों को पढ़ माफ़ कीजिएगा मुझे भी हंशी आ गई..........वास्तव में आपने अपनी जो मनोस्तिथि वहां के बारे में बताई उसी को सोच सोच वास्तव में कविता कहने या बहुत सुन्दर और सजीले ढंग से कहने से ही किसी के अच्छे या बुरे होने की बात समझ में नहीं आती ........आती है तो बस उसके अन्दर छुपे भावों से जो की कितनी गहराई के साथ कही गई है इसे बतलानी चाहिए.........आपको खेद के साथ कहना चाहूँगा की आपने एक अच्छा मौक़ा गवा दिया वास्तविक नारी शक्ति को दर्शाने का...............किस बात की नारी कैसी नारी............ये समझाने का......अगर आपको बिना कुछ कहे ही एक विशेष संबोधन दिया गया वो भी प्राकृतिक तथ्यों पर तो उन लोगों को जो वहां मौजूद थे एक करारा जवाब तथा जन्मदिवस की एक तोहफा भी मिलना चाहिए था ताकि वो समझ सकें की शब्दों का असली महत्व क्या होता है..............शायद आप मेरी बातों को न समझ पायें क्यूंकि यह बहुत लम्बी बात है................कुछ गलत लगे तो माफ़ी चाहूँगा...........नवरात्री की परिवार सहित शुभकामनाएं

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

आदरणीय अशोक सर .. नमस्कार .. बिलकुल सही कहा आपने .. वो काव्य गोष्ठी तो एक बहाना था ... मैंने जानबूझ कर वो वाला प्रसंग नहीं डाला ... जादातर टाइम बस फोटोशेसन ही होता रहा ... यंहा तक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी .. जबरदस्ती फोटो के लिए रोके रखा गया ताकि आछे फोटो अखबार में डाले जाए ... मेरे लिए ये पहला अनुभव था ...और मैं चकित थी .. ये अलग बात है मैंने वंहा कुछ भी जाहिर होने नहीं दिया ..... और एक बात यही भी अनुभव किया रिपोर्टिंग करना और साहित्य सृजन दोनों अलग चीजे है .. डेली न्यूज़ का रिपोर्टर या कहे पत्रकार साहित्य का समझ रखता हो ये जरुरी नहीं है ....क्योंकि ज्यादातर उन्ही से वास्ता पड़े मुझे उस दिन .... आपने आलेख को अपना सर्थन दिया और शब्द दिए ... आपका ह्रदय से आभारी हूँ ......धन्यवाद आपका

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

आदरणीय महिमा जी, सादर प्रणाम ..... यह बड़ी बिडम्बना और ग्लानि का विषय है कि , हम भारतीय , महिलाओं के प्रति इतना सम्मान , आदर और श्रद्धा रखते हैं , साल में दो बार देवी के पर्व मनाते हैं पर इसका प्रभाव वह नहीं है जो हम पर्वों , चित्रों , मंदिरों , यज्ञों , जागरणों में ब्यक्त , प्रदर्शित करते हैं ....देवी जो नारी कि प्रतिदेवी हैं , उनके प्रति हमारा रोज-ब रोज का रवैया , बहुत दुखद , खेदजनक और घृणास्पद है , जो कहता है - हम सभी तो नहीं पर अतिअधिक मनसा -वाचा-कर्मणा एक नहीं हैं ....इसपर हमे सोचना चाहिए और नारी के प्रति , समानता , श्रद्धा , सम्मान , ब्यवहार में लाना चाहिए , ( इसका अर्थ नर -नारी में परस्पर , स्नेह , प्रेम , संपर्क , सम्बन्ध , प्रेम , मित्रता का निषेध नहीं है , समानता -आदर की दरकार है ) ....आज समाज में जो नारी का शोषण हर स्तर पर दृश्यमान है , वह हमारी भारतीय संस्कृति , सभ्यता और सोच पर एक बदनुमा दाग है ......एक देवी की फोटो लगा कर , जागरण कर और पैदल पहाड़ों पर चढ़ कर देवी की पूजा अर्चना और व्रत -पूजा करके जय देवी कहने से , भला होने की प्रवृत्ति पर विचार करने की जरूरत है ......भक्त , देवता -देवी , मंदिर -संयासी सभी को पुनर- प्राण -प्रतिष्ठा की जरूरत है ......पत्थर की देवी की पूजा , दया , की मांग और जीवित देवी का नाना-प्रकार से शोषण , क्या यह हमारा दोहरा चरित्र नहीं है ? ******************************************************************************. स्त्री को देवी समान दर्जा देने वाले भारत देश की महिलाओं ने अपने प्रयासों, अपने कार्यों और अपने लक्ष्यों के बल पर दुनियाभर में सम्मान और वही देवी का दर्जा हासिल किया है। राजनीति, उद्योग, समाजसेवा, खेल या फिर फिल्मों की ही बात क्यों न हो, भारतीय महिलाओं ने हर जगह अपनी मेहनत के बल पर पुरुष प्रधान समाज में अपनी सशक्त दावेदारी प्रस्तुत की है। पेश है एक सूची: 1828-1858 : झाँसी की रानी रानी लक्ष्मीबाई की वजह से ही 1857 में झाँसी सेनानियों का केंद्र बना। अँगरेजों के खिलाफ जमकर आग उगली थी। 1725-1795 : देवी अहिल्याबाई मालवा की राजमाता रहीं। बिना मदद के राजपाठ चलाया। न्यायप्रिय अहिल्यादेवी ने बेटे तक को मृत्युदंड दिया। 1919-1984 : इंदिरा गाँधी भारत की लौह महिला। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री। पाक को धूल चटाई, बांग्लादेश आजाद कराया। आपातकाल लगाया। 1869-1944 : कस्तूरबा गाँधी महात्मा गाँधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलीं। गिरफ्तार भी हुईं। बा भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय रहीं। 1919-2005 : अमृता प्रीतम पहली पंजाबी महिला लेखक और कवयित्री। 16 साल की उम्र में पहला संकलन आया। उनके उपन्यास पिंजर पर फिल्म भी बनी। 1910-1997 : मदर टेरेसा मानव सेवा पर ही जीवन निकाला। कच्ची उम्र में ही सेवा शुरू की। कुष्ठरोग से लड़ते हुए उनको नोबल पुरस्कार मिला। 1879-1949: सरोजिनी नायडू भारत की कोकिला के नाम से जानी जाती थीं। कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। आजादी की लड़ाई में गाँधीजी की साथी। 1964 : पीटी उषा ख्यात एथलीट। गरीब परिवार से उठकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम जमाया। पद्मश्री और अर्जुन पुरस्कार पा चुकी हैं। 1961-2003 : कल्पना चावला भारत में जन्मी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री थीं। वे 1995 में नासा से जुड़ीं। नासा में उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। 1965 : सुनीता विलियम भारत की दूसरी महिला, जिसे नासा ने अपने अंतरिक्ष अभियान के लिए चुना। उनके नाम अंतरिक्ष में चलने का रेकार्ड है। 1971 : किरण देसाई भारतीय मूल की लेखिका किरण देसाई ने अपने नॉवेल 'द इनहेरिटेंस ऑफ लॉस' के लिए वर्ष 2006 का बुकर पुरस्कार जीता। 1958 : इंदिरा नूई फोर्ब्स पत्रिका ने इंदिरा नूई को दुनिया की 100 शक्तिशाली महिलाओं में चौथा स्थान दिया। ये पेप्सीको की एक्जीक्यूटिव चेयरपर्सन हैं। 1907-1987 : महादेवी वर्मा ख्यात हिन्दी कवयित्री। उन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है। छायावाद पर कार्य किया। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1929 : लता मंगेशकर दुनिया की सबसे श्रेष्ठ गायिका। देश- विदेश में कई पुरस्कार मिले हैं। कई बार फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार। 1940 : सोनल मानसिंह देश की ख्यात ओडिसी नर्तकी। सबसे कम उम्र में इन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। 1954 : मेधा पाटकर सामाजिक कार्यकर्ता। नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रणेता।

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

महिमा जी             सादर, बहुत सच्चे मन से आपने जों बात रखी है वह बहुत ही ह्रदयस्पर्शी है.आजकल यह चलन देखने को मिलता है कि जन्मदिन जैसे अवसर पर ऐसे आयोजन सिर्फ अपने गुणगान करवाने के लिए ही आयोजित किये जाते हैं जिसे फिर दूसरे दिन अखबार में प्रकाशित कर अपनी महानता से पाठकों को अवगत कराया जाता है. आपने सही कहा है स्त्री पहले एक इंसान है उसे इंसान का दर्जा तो पहले सही तरीके से दो / उसे जीने तो दो / उसे समूल नस्ट कर और फिर मूर्तियाँ स्थापित करने का कुचक्र बंद करो / बंद करो महिमामंडन का ढोग / उसे बस समाज का हिस्सा बन ने दो / आसमान पे बिठाने का स्वांग बंद करो / नारी को सिर्फ नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेंगी / सुन्दर और सच्चे आलेख के लिए बधाई स्वीकारें.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: jai... jai...

ये कैसा विरोधाभास है इस भारत भूमि का / क्यों पूजा के लिए स्त्री को प्रतिस्थापित किया और बड़े -२ गुणगान किये गए है / जबकि करनी में तो कुछ और ही दीखता है / स्त्री पहले एक इंसान है उसे इंसान का दर्जा तो पहले सही तरीके से दो / उसे जीने तो दो / उसे समूल नस्ट कर और फिर मूर्तियाँ स्थापित करने का कुचक्र बंद करो / बंद करो महिमामंडन का ढोग / उसे बस समाज का हिस्सा बन ने दो / आसमान पे बिठाने का स्वांग बंद करो / नारी को सिर्फ नारी ही रहने दो वो अपनी शक्ति स्वयं पहचान लेंगी / आदिकाल से नारी स्वयं है पहचान निज कारन से अबला कह स्वयं बने बलवान नारी कई रूपों men संस्कार जगाती और न सही माता तो कहलाती आपकी व्यथा है सच्ची katha धन्य आप जो सबे सुने इसी बात पे देता हूँ आपको बधाई. स्नेही महिमा जी, सादर

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

परम आदरणीय महिमा जी ,सादर प्रणाम .... एक किसान परिवार का बेटा होने के कारण ,और आपकी कविता की सच्चाई.................... ने दिल को छू लिया ...दिनों दिन बढ़ता पेस्टीसाईड अन्न और जल में जहर घोल रहा हैं ,मृदा की प्राकृतिक इम्युनिटी उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रहा हैं .....समाज भी जागरूक हों रहा हैं ...पर किसानो का उत्पाद आज भी सही कीमत पर नही जा रहा हैं ..मेहनत करता किसान हैं ,फायदे उठाते बिचौलिए लोग हैं .......अब तो GM CROPS भी आ गयी हैं ,पर इस बात की कोई गारंटी नही की हमारे स्वास्थ्य को कितना नुकसान पहुचएँगी क्यूंकि जो फसल छोटे कीटो को मार सकती हैं वह इंसानों को भी किसी ना किसी मात्रा में नुकसान पंहुचा सकती हैं ........इस मंच पर पढ़े गए उम्दा ब्लोगों में से एक ब्लॉग ,बहुत आभार ....आपका अजय http://avchetnmn.jagranjunction.com/

के द्वारा: ajaykr ajaykr

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

महिमा जी कल से इंतजार कर रहे थे कि आप कुछ बोलें. बोलीं भी तो चोरी का इलज़ाम लगा दिया. मोहतरमा...मछली आपके गाँव के लोगों ने श्रद्धा के साथ विदाई में दी थी. हाँ यह नहीं जानते कि कहाँ से ला कर दी. वह आप के तालाब की थीं या फिर ग्राम सभा के तालाब की थीं. एक बात तो बताना ही भूल गया था.. आपके यहाँ मैंने मटर और भिन्डी भी खायीं और पोटली भी बाँध ली. आप रहतीं तो पता नहीं मिलता भी या नहीं. शुक्र है आप नहीं थीं. मैं अक्सर देख रहा हूँ कि जब भी गुरु और शिष्य का संवाद हो रहा है तो मजे लेने के लिए बीच में टपक आ रही हैं. मेरी क्लास लग रही है तो आपको मजा आरहा है. घबराईये न...जल्दी ही मेरा भी मौका आएगा......:) :) :) मेरे भी चहरे पर स्माईल छाएगी.

के द्वारा: Ajay Kumar Dubey Ajay Kumar Dubey

आदरणीय सर , सर्वप्रथम तो आपका स्वागत है.. पहलीबार मेरे ब्लॉग पे आये / सर कैसी बात करते है खेद काहे का .. अजय जी के बहाने ही सही कितना रोचक प्रसंग सुनने को हमे मिला / कल ही उस पे मैं टिपण्णी देती पर लोगिन काम ही नहीं कर रहा था / रचना के लिए आपकी प्रशंसा बहुत ही मायने रखती है सर / आपका ह्रदय से आभारी हूँ / सधन्यवाद / जहा तक बसंती वाली बात है सर तो महोदया बहुत दिनों से चोरी वाला कार्य कर रही थी पर इस बार साबुत हाथ लग गया और रंगे हाथो पकड़ी गयी / अगर कुछ इमानदारी से लिखने की क़ाबलियत होती तो क्षमा मांगे के कुछ अपना लिखा ले के आती ना की बोरिया बिस्तर समेत गायब हो जाती / प्रेरित तो मैंने उसे उस वक्त भी किया था की कुछ अपना लिखिए महोदया कौन लोग नए में इधर उधर करते है मुझे नहीं मालुम / पर मैंने कभी भी इधर उधर नहीं किया है इसलिए मुझे आश्चर्य होता है / पर आपकी बात को ध्यान रखूंगी / आलेख में तो आकडे लेने ही पड़ते है सभी को .. पर उसने तो पूराआलेख दुसरे का अपने नाम से टाइप कर दिया था / आप अपनी जगह पे सोच के देखिये सर आपका कोई आलेख कहीं कोई अपने नाम से पोस्ट कर दे .. कैसा अनुभव करेंगे / सभी को अपने रचनाये संतान जसी प्रिय होती है इस बात से आप सहमत है ना सर / अगर मैंने फिर बसंती वाली स्टाइल में ज्यादा बक बक कर गयी तो माफ़ी चाहूंगी सर / अप हमारे बुजुर्ग है / आपका कहा टाल सकते है क्या / आगे से ध्यान रखूंगी :)

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

महिमा जी, सबसे पहले तो खेद प्रकट करना चाहूँगा कि आपके इस ब्लॉग पर दुबे जी के लिए लिखी गई मेरी प्रतिक्रया उनकी टिप्पणी के नीचे की बजाय गलत जगह पोस्ट हो गई. उम्मीद है आपको कोई भ्रान्ति नहीं हुई होगी. दुबे जी ने शायद बात को समझते हुए उसपर अपनी जवाबी टिप्पणी डालकर संशय समाप्त किया, उनकी समझदारी को साधुवाद . आपका गाँव बड़ा प्यारा है. कोई चीज़ छोडी नहीं, सबको समेटा है. बधाई स्वीकार करें. लेकिन आपने उस तहलका वाली लड़की को जो मंच का चार चक्कर लगवाकर शोले की बातूनी बसंती वाली अपनी ख़ास स्टाइल में टेशन तक छोड़ कर ही दम लिया, ये कुछ ठीक नहीं किया. अरे एक दो ब्लॉग के बाद रास्ते पर आ जाती बेचारी. आप तो पंजे झाड़कर ही पीछे पड़ गईं. अब आगे कृपया ऐसा जुल्म मत करना, और मेरी बात को अन्यथा भी मत लेना. कहीं दिखे तो उसे फिर से प्रेरित करने में कोई बुराई नहीं है. नए-नए में सभी थोड़ा इधर उधर करते हैं, यह कोई असामान्य बात नहीं है.

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

प्रिय आनंद जी .. आप तो मुझे खुश कर देते हैं .. सच आपके शब्द कितना उत्साह बढ़ाते है बता नहीं सकती .. उर्जा का संचार होने लगता .. एकदम से जाग जाती हूँ .. हां पता नही तस्वीर क्यों गायब हो गयी है .. शायद मेरे शब्द गाव कहाँ है को चरितार्थ करने का कोशिश कर रही है :) :) “दिठोना” का अर्थ जब माँ या दादी छोटे बच्चे को नजर से बचने के लिए ललाट पर गोल काजल का टिका लगाती है उसी को दिठोना कहते हैं .. :) अब याद आ गया ना जब माँ ने आपको भी लगाया होगा :) आप सब आनंदित हुए .. यही प्रयास था लिखना सार्थक हुआ "वाह वाह वाह वाह वाह हुजुर आप तो छा गए " :) :) :) :) आपने भी मुझे झार पे चडा दिया .. हम्म हम्म अब उतरने का मन नहीं कर रहा है .. नशा जैसा हो रहा है :)

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

दुबे जी, मेरे पड़ोस के गाँव के एक मेरे पूजनीय चुम्मन बाबा थे, चुम्मन तिवारी (असली नाम नहीं बताऊँगा) । वह भी आपही की तरह कम्बल ओढ़ कर घी पीते थे । गाँव घर की नजर में शुद्ध शाकाहारी और पूजापाठ वाले परम्परावादी बाबा । पोल तब खुली जब हम एक साथ धंधे के सिलसिले में अपने गृहराज्य से बाहर मिले । मैं जानबूझ कर उन्हें एक ऐसे रेस्टोरेन्ट में ले गया, जहाँ शाकाहारी भी खाया जा सकता था, तथा वाइन एन्ड डाइन की भी उत्तम व्यवस्था थी । अपने लिये बीयर मंगवा कर उन्हें दिखा-दिखा कर चुसकने लगा, तो टेबल के नीचे उनके दोनों पाँव ज़ोर-ज़ोर से ऐसे हिलने लगे, जैसे मिर्गी का दौरा पड़ने वाला हो । मैंने यूँ ही पूछा कि बाबा आपने तो कभी चखी भी नहीं होगी । जवाब में सुर्ती से पीले पड़ चुके दाँत निकाल कर हें हें हें हें करने लगे । मैं सब समझ गया, और बिना एक क्षण खोए उन्होंने मुझे अपना हमराज बना लिया । दो घंटे बाद जब हम उठे, तो टेबल पर उनके सामने चिकेन तन्दूर और फ़िश फ़्राई की बची हड्डियों और काँटों का ढेर लग चुका था, ज़ुबान और पाँव दोनों ही लड़खड़ा भी रहे थे । मुझे आप भी आज कुछ-कुछ चुम्मन बाबा जैसे ही दिख रहे हैं । गलत हो तो कान पकड़ने के लिये तैयार हूँ ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

आदरणीय महिमा बहिन (श्री श्री एक सौ आठ ) जी .... सादर अभिवादन ! नारी नारी की दुश्मन बनती चली आई है इस कहावत को झूठा सिद्द करने के लिए ही मैंने तो बहुत ही खुश हो कर ज़बरदस्ती से ही आप सभी में कोई समानता तलाशी थी ...... दिव्या बहिन की रचना में नहीं बल्कि उनके द्वारा मेरी पिछली रचना पर रात को लाईट जाने पर घर की बड़ी महिलाओं से भूत प्रेतों की कथाये सुनने के बारे में बतलाया था ..... क्योंकि सभी महिलाओं में कम से कम इस मंच पर तो तालमेल होना ही चाहिए .... आपके ब्लॉग पर एक मुद्दत के बाद प्रतिकिर्या देने में सफलता मिल पाई है ..... (वैसे मेरा यह मानना “था” की जो भी सरिता जी पहले करेगी आप उसको बाद में जरूर करेंगी –बेचारी के.जी. में पढ़ने वाली वोह चोरनी बच्ची जोकि इस मंच से फिलहाल चली गई है ) जय श्री कृष्ण जी :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

महिमा जी, नमस्कार सबसे पहले तो आप यह बताइये की जो तस्वीर आपने ऊपर लगाईं थी "वो कहाँ है' कहीं गाँव में गम तो नहीं हो गईं फिर ज़रा मुझे "दिठोना" का अर्थ समझाइये सर के ऊपर से निकल गया फिर आपकी रचना पर आता हूँ ..............मोहतरमा आपने जिस गाँव का जिक्र किया है ऐसा गाँव यदि आपका था तो बहुत ही अद्भुत और रोचक गाँव था जहाँ एक साथ इतने तथ्य थे .................. रचना तो आपकी जोरदार होती ही है.............अब आपभी कविओं वाला गुण दिखाने लगीं है वरना एक गावों में .......भैस का जंगल में खोना ..........साप के लिए बिन बजाना ........मोटर की आवाज़ .....टमटम .....मेढक ......और सबसे बढ़िया ........हमार नाइकी भौजी का दिफिनेसन आपके द्वारा वाह वाह वाह वाह वाह हुजुर आप तो छा गए

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

वो कभी आसमान की और देखता तो कभी हाथ में पकडे उन ८० रुपयों को. और फिर सहसा ही उसके पाँव कलाली की दूकान की तरफ मुड पड़े. जहाँ उसको मिलेगी उसके हर दुःख की दवा. वहां बैठ कर वो सूखी मछली के साथ पिएगा देसी ठर्रा और वादा करेगा अपने आप से कि कल फिर काम पर जाना है, पैसे जमा करने है और घर वालों की हरेक इच्छा पूरी करनी है. खैर, अभी तो हफ्ते दो हफ्ते का काम बाकी है कुछ न कुछ तो कर ही लेगा वो. ये उसकी मजबूरी है या उसका शौक ? मैं नहीं जानता लेकिन बार का खुद से किया वादा अगर टूटने लगता है तो अपना ही वजूद ख़त्म हो जाता है ! दूसरे से किया वादा टूटे तो दर्द होता है किन्तु खुद से किया हुआ वादा टूटता है तो बहुत कुछ ख़त्म सा हो जाता है ! बढ़िया कहानी , महिमा जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्रतिकार का अधिकार ही हथियार है जन्तन्त्र का... और मूक बधिरों को यहाँ बस शोभती परतंत्रता.... है स्फुटित होता नही हुंकार हाहाकार से... है सीखनी अब अश्रुओं से आग जनने की कला.... है पर्वतों के सामने क्या धार सरिता का रुका... क्या मूषकों के सामने है शीश सिंहों का झुका... क्या भीरू वंशज हो गये हैं उस भरत सम्राट के... था सीखता जो सिंह दाँतों से विहँस कर गिनतियाँ... निस्तब्धता की ओट मे अब सूर्य भी छुपने लगा है... चंद्र सब अपनी कलायें भूलकर घुटने लगा है... रज्नियाँ देखो तिमिर की दासियाँ सी बन गयी हैं... नील नभ लज्जा से देखो संकुचित होने लगा है... अठखेलियों मे खो चुके यौवन ज़रा सा जाग जाओ... हे सघन रक्तिम हृदय श्रावण ज़रा सा जाग जाओ... कापुरुष जनने की भारत भूमि की आदत नही है... क्रांति का विस्तार बन जीवन ज़रा सा जाग जाओ... अब दिशाओं मे अनल से क्रांति का इक नाद भर दो... मृत्यूशैय्या पर पड़े इस भीष्म मे नव्श्वास भर दो... इन अभागी चीखती बलिवेदियों की माँग भर दो... धमनियों मे राष्ट्र की नवरक्त का संचार भर दो... अस्मिता का राष्ट्र की जो कर रहे व्यापार देखो... धर्म भी कहता कि उनका मृत्यु ही उपहार देखो... देशद्रोही शीश मुंडों से बने जयमाल नूतन... भारती माँ का तभी समझो हुआ श्रृंगार देखो... (Thus was written there)

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

महिमा जी, नमस्कार क्या कहूँ बिलकुल समाज की सच्चाई को रखा है आपने ...........यह कोई नई बात तो नहीं है पर आज यह देख दुःख होता है............जिम्मेवार कोई भी हो किन्तु यह सच है की दूरियां बढती जा रही है आमिर और गरीब में ........और मध्यम वर्ग पेंडुलम बना झूल रहा है............कभी निम्न तो कभी उच्च ..............पर जो भी हो यह दुखद है...........और मेरे हिसाब से इसका सबसे बड़ा कारण सिर्फ एक है.........भारत में कोम्निस्ट तंत्र का फेल होना...........यहाँ का कोमिनिस्ट चोरों के हाथों में है जिन्हें इसका अर्थ ही नहीं पता वरना देश की कम्पनी चलाने वाले मुकेश अम्बानी जैसे लोग राजा महराजा जैसे ४५००० करोड़ के घर में नहीं रहते......क्या इसे किसी भी कारन से लोकतंत्र कहा जा सकता है............. बहुत ही सुन्दर कहानी ........किन्तु लगता है सेटिंग में कुछ गरबरी है अपने जगह से हिली हुई है........कहीं गर्मी में आपका दिमाग तो...............मजाक है ......हा हा

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: gauravsaxena gauravsaxena

महिमा जी सबसे निचे हीं सही पर आपके दोस्तों की फेरिस्तों में हम भी हैं ....फिर हमसे यह बहुमूल्य हीरा क्यूँ छिपाया ....एक मेल कर देतीं......मैं जागरण का प्रथम पृष्ठ नहीं देखता तो कई बार ऐसी खूबसूरत ज्ञान-प्रद आलेखों से वंचित रह जाता हूँ ....पर आपका तो मैंने 'follow my blog' ka option bhi subscribe kiya hua hai ..फिर भी इसके बाबत कोई मेल नहीं आया .....बहुत खूबसूरत विधा है यह हाइकु ....शब्दों को समीचीन और संक्षिप्त रखकर प्रभावशाली बातें कहना ....यह साहित्य जगत का २० -२० मैच है ...पर मेरे मुफीद नहीं ...मैं व्याकरणिक बाड़े में बंधकर अपनी बातें नहीं कह सकता ....मैं अंजुल में समंदर नहीं उतार सकता ....मैं तो कम शब्दों में ऐसी हीं कुछ बातें कह सकता हूँ जो हैकु नहीं है - कब्र से चलेगा राहिला मुर्दों का चुपचाप जमीन के अन्दर और जब मुर्दों की भीड़ किसी चौराहे पर मिल जाएगी ... सतह से ऊँची उठी हर एक विशाल अट्टालिकाएं हिल जाएगी

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

I read, लेकिन मैं आपकी विश्लेषण से संतुष्ट नहीं हूँ, आप ने जो कुछ भी कहा है सच कहा है,,,,अगर मैं कहता तो इससे भी तीखा कहता क्योंकि ज़मीनी हक़ीक़त इससे भी कड़वी है.....लेकिन मैं किसी और बात से असंतुष्ट हूँ,,,,, क्या कहा गया है मेरे लिए ये बिल्कुल मायने नहीं रखता है....किस ने कहा है और क्यों कहा है ये बात मेरे लिए जियादा महत्व की है........ आपकी विश्लेषण एक स्त्री की विश्लेषण है और अंतोगत्वा आप की विश्लेषण है...अपने जो जैसा है उसको वैसे न कह कर वैसा कहा है जैसा कि आप कहना चाहती थी....,,इसीलिए आपकी सभी लिखी बातें व्यक्तिगत सच है न कि परमार्थिक......ये सब व्यभारिक सच है....कहने और सुनने योग्य...इसमे ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे रूपांतरण संभव हो सके.....और इसी बात से मे असंतुष्ट हूँ........'When a woman is saying something, a woman is saying something, it is never everything....' Sandeep .

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

प्रिय संदीप जी , मैं आपसे असहमत नहीं हूँ क्योकि बसों की शैली से बिलकुल अलग है हिंदी में प्रचलित हायकू ... सर्व प्रथम तो बाशो ने हायकू को सिर्फ प्रकृति की सुन्दरता और विविधता की प्रस्तुति का माध्यम बनाया है ....उसमे कही भी व्यंग या सामाजिक कटाक्ष का स्थान नहीं है और ५/७/५ जैसा शिल्प का नियम भी नहीं है .. अतः हिंदी साहित्य में प्रचलित हायकू सर्वथा बशों के हायकू से भिन्न है ..पर चूँकि मैं हिंदी में लिखती हूँ और पढ़ती हूँ अतः यहाँ जो प्रचलित हायकू के जो नियम है उसी का पालन करुँगी .... बाकि जो मैंने हायकू का हिंदी साहित्य में जाने माने विद्वान का क्या सोचना है मैं यहाँ उधृत कर रही हूँ ........................................ हाइकु काव्य का प्रिय विषय प्रकृति रहा है। हाइकु प्रकृति को माध्यम बनाकर मनुष्य की भावनाओं को प्रकट करता है। हिंदी में इस प्रकार के हाइकु लिखे जा रहे हैं। परंतु अधिकांश हिंदी हाइकु में व्यंग्य दिखाई देता है। व्यंग्य हाइकु कविता का विषय नहीं है। परंतु जापान में भी व्यंग्य परक काव्य लिखा जाता है। क्योंकि व्यंग्य मनुष्य के दैनिक जीवन से अलग नहीं है। जापान में इसे हाइकु न कहकर 'सेर्न्यू' कहा जाता है। हिंदी कविता में व्यंग्य की उपस्थिति सदैव से रही है। इसलिए इसे हाइकु से अलग रखा जाना बहुत कठिन है। इस संदर्भ में कमलेश भट्ट 'कमल' का विचार उचित प्रतीत होता है - "हिंदी में हाइकु और 'सेर्न्यू' के एकीकरण का मुद्दा भी बीच-बीच में बहस के केंद्र में आता रहता है। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी में हाइकु और 'सेर्न्यू' दोनों विधाएँ हाइकु के रूप में ही एकाकार हो चुकी है और यह स्थिति बनी रहे यही हाइकु विधा के हित में होगा। क्योंकि जापानी 'सेर्न्यू' को हल्के-फुल्के अंदाज़ वाली रचना माना जाता है और हिंदी में ऐसी रचनाएँ हास्य-व्यंग्य के रूप में प्राय: मान्यता प्राप्त कर चुकी हैं। अत: हिंदी में केवल शिल्प के आधार पर 'सेर्न्यू' को अलग से कोई पहचान मिल पाएगी, इसमें संदेह है। फिर वर्ण्य विषय के आधार पर हाइकु को वर्गीकृत/विभक्त करना हिंदी में संभव नहीं लग रहा है। क्योंकि जापानी हाइकु में प्रकृति के एक महत्वपूर्ण तत्व होते हुए भी हिंदी हाइकु में उसकी अनिवार्यता का बंधन सर्वस्वीकृत नहीं हो पाया है। हिंदी कविता में विषयों की इतनी विविधता है कि उसके चलते यहाँ हाइकु का वर्ण्य विषय बहुत-बहुत व्यापक है। जो कुछ भी हिंदी कविता में हैं, वह सबकुछ हाइकु में भी आ रहा है। संभवत: इसी प्रवृत्ति के चलते हिंदी की हाइकु कविता कहीं से विजातीय नहीं लगती।" कमलेश भट्ट कमल, 'हिंदी हाइकु : इतिहास और उपलब्धि' - संपादक- डॉ. रामनारायण पटेल 'राम' पृष्ठ-४२) बाकि जो हिंदी में प्रचलित हायकू के नियम है मैंने मुख्य पन्ने में यथा रखा दिया है ....

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

महिमा जी आपकी इस सुन्दर पर सोगकुन कविता ने मेरे ज़ज्बाती रगों को कुछ यूं छेड़ा है कि एक खला सी बन गयी है सीने में ....आपकी कविता से मेरे ज़ेहन में आपका जो एक अक्स उभरा है उसके मद्दे-नज़र एक कविता लिख रहा हूँ ...गौर फरमाइयेगा - पैबश्त होता दर्द जब सालता है दिल को मद्ध्यम मद्ध्यम अश्कों का गुरेज़ नहीं बहता लहू बस खलता है; तेरे हंसी की सिलवटों के कई अक्षर गूढ़ , कहीं कोई दर्द छिपा है बस खलता है और ज़नाब अकबर साहेब ,सलाम वाले कुम ! कविता लिखना जितनी श्रेष्ठ कला है ,उतना ही अज़ीम हुनर है कविता पढ़कर समझना .....महिमा जी की कविता के लिए आपकी अजीब सी प्रतिक्रया देख,आपको जानने के इरादे से मैंने आपकी कुछ तहरीरें पढ़ी .... समझ में आया कि आप लिखने के मामले में तो बड़े हुनरमंद हैं पर समझने के मामले में आप अपने दानिश्गी का जामा कहीं उतार फेंकते हैं ....आपसे अपने इन दो लाइनों के ज़रिये यही कहना चाहूंगा कि - लफ़्ज़-ए-दिल के लब्बोलुआब इतने आसान नहीं होते गम-ए-हयात चाहिये इसे समझने के लिये

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

प्रिय संदीप जी और योगेश जी, कमोबेश आप दोनों का कहने का आशय अक ही लग रहा है..ये रचना आपको कोई खास नहीं लगी, मेरा भी यही कहना है की मेरी कविता मेरी सर्वश्रेठ कृति नहीं है ....और ये बहुत अच्छी बात है की आप दोनों मुझे अच्छे समालोचक के तौर पर मिल गए , क्योंकि आलोचना से बहस होती है , बहुत सारी बातें बाहर निकल के आती है , अपनी कमियों को निकारने का मौका मिलता है ...दिमाग का विस्तार होता है ..कहते हैं न "निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाए, बिन पानी साबुन बिना , निर्मल होए सुवाये" ::)) तो आप दोनों का मेरे ब्लॉग में बड़े ही हर्ष के साथ स्वागत करती हूँ ::)) रही बात मेरी कविता समझाने की तो संदीप जी जो आप अपने कमेन्ट में कह रहे है , ओर अपने आलेख में समझा रहे हैं वही मैं इस कविता में कह रही हूँ , की दुनियावालो अपने चेहरे मत छिपाओ , खुलकर सामने आओ, जैसे हो वैसे ही रहो , दीखाने के लिए नाप तौल का मत बोलो , दिल खोल कर सामने रखो , कुछ छिपाओ मत, आपने कहा i love naked truth,वही तो मैं कह रही हूँ , सच्चाई के साथ रहो , दिखावा मत करो, हम बन कर आने दो -का मतलब जो आपने मैं और मेरी समस्याएँ में तो खुद देदिया है, जो आप कह रहे है ..मैं जो हूँ मुझे वही बने रहने दो , मुझे धर्म , जाती , दुनियावी ,आदि से बाहर आना है , आने दो रोको मत ... मेरी टाइपिंग थोड़ी ढीली है ..इस लिए short cut में लिख रही हूँ........अगली बार...

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

मोहतरमा नमस्कार, आपकी कविता पढ़ी. माफ़ कीजिये मैं ये तो नहीं सकता मुझे बहुत ज्यादा अच्छी लगी या या मेरा दिल बाग-बाग हो गया मगर फिर भी आपका प्रयास अच्छा था.... संभव है ये मेरी नादान बुद्धि की वजह से ऐसा हुआ हो.. या मेरे कविता के प्रति नासमझी के चलते ऐसे हुआ हो.. आपकी योग्यता पे प्रश्न खड़ा करना मेरा उद्देश्य नहीं है. जबकि मैं खुद एक नौसिखिया हूँ.. .. मैंने कविता को तुकबन्दी के साथ मिलाने की कोशिश की.. मगर थोडा असफल रहा .. बाकी रहा कविता के मर्म या भावों के बारे में ..मुझे इन्हें समझना भी अभी सीखना है.. खैर माफ़ करियेगा.. मेरी इस तरह के कमेन्ट के लिए.. मुझे नादान या नौसिखिया समझ लीजियेगा... खैर मैं आपकी कवितायेँ ऐसे ही पढता रहूँगा सीखने के लिए..

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार..... मेरी रचना आपको कैसी लगी........?

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

कुछ समय पहले मैंने एक article लिखा था, आपकी कविता को पढ़ने के बाद मेरा मन कर रहा है कि मैं वो आर्टिक्ल यहाँ पोस्ट कर दूँ......शायद आपसे ज्यादा अच्छे से उसे कोई नहीं समझ सकता है......   Neither this nor that! The famous American poet Robert Lee Frost writes in his beautiful poetry ‘The Road Not Taken’, “Two roads diverged in a yellow wood, And sorry I could not travel both.” Having read this thought provoking line from the poem, I wondered if it is only Frost who is sorry for not being able to travel both, or we all are sorry for not being able to travel both…? Isn’t our lives split into two, regretting about the past which is no more and planning for the future (projection of past) which has not come yet (God knows if it will ever come, for that which comes is never future). Aristotelian logic says, “either A or not-A; not third option.” And I think Aristotle (means Mind, because to me he is nothing but mind) is absolutely right, for we are always confused with either this…or that…., always at the cross road, wondering which path to travel on, never absolute about anything, always confused with what to do and what not to do, what is right and what is wrong….always regretting about past and wondering what if I had traveled on that road…., what if I had not chosen this….? Now the question is, is there any way out……? Can one jump out of this vicious circle of either this (good/right)….or that (bad/wrong)….? Is there any life which exists beyond the life of Aristotle and Soren Kierkegaard…..? Can we attain to the state of absolute clarity…a state of absolute choicelessness, a state of Neither this….nor that….नेति-नेति......? What would be the state of total relaxation…..?

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

स्नेही महिमा जी, नमस्कार , सब से पहले आप से मुलाकात में हुई देरी के लिए क्षमा चाहती हूँ. दरअसल गृहणी होने के नाते जिम्मेदारियां कुछ ज्यादा ही हैं.तो कभी यहाँ कभी वहां कुछ न कुछ कमी रह ही जाती है.खैर.... आप का यह लेख बहुत ही साहसिक व् ज्वलंत मुद्दे पर है. इस स्थिति से लगभग हर स्त्री को गुज़रना ही पड़ता है. इसी लिए ईश्वर ने स्त्री की छठी इन्द्रिय काफी सशक्त बना रखी है. लेकिन वीकर जेंडर होने के कारण मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है. महिला दिवस को क्या कहें....एक बार मैं ने इस विषय पर एक आर्टिकिल लिखा था "every dog(bitch) has its day"तो मुझे काफी भर्त्सना का सामना करना पड़ा था..... एक पुराने ब्लॉग का लिंक दे रही हूँ..देखिये गा.... http://sinsera.jagranjunction.com/2011/12/24/%E0%A4%AD%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AD%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%80/

के द्वारा: sinsera sinsera

महिमा जी, निश्चित ही कामांधता एक विकृत मनोरोग है, आपका यह कहना कि बच्ची से देह व्यापार कराने को विवश करने का दोषी समाज है। समाज तो हम आप से ही मिलकर बनता है। जिस तरह से जान लेवा बीमारियों से मुक्ति पाने के लिये हमें कड़वी दवायें लेना पड़ती हैं तथा अपने छोटे से बच्चे के स्वस्थ भविष्य के लिये दर्द करने वाले लगवाते हैं, उसी तरह से हमें समाज को स्वस्थ बनाने  के लिये उस औरत को कड़ी सजा देना पड़ेगी, अपनी विवशता का रोना रोकर तथा समाज पर दोष डालकर अपनी अबोध बच्ची को एक भयावह दलदल में डाल दिया। ईश्वर ने ऐसी महिला को माँ बनने का अधिकार कैसे दे दिया। क्या हम इसका सारा दोष ईश्वर पर डालकर अपने कर्त्तव्यों से मुक्त नहीं हो सकते। क्या वह नारी है, इसलिये हम उसे अमानवीय अपराध से मुक्त कर दें। यह तो न्याय शास्त्र सिद्धांत के विपरीत होगा। इस तरह तो हर अपराधी अपनी विवशता बताकर अपने अपराध से मुक्त हो जायेगा।    मैंने यह टिप्पणी, उस बच्ची को अपने में आरोपित करके लिखी है इस लिये शायद अधिक लिख दिया। क्षमा करें, कुछ अधिक भावुक एवं संवेदनशील हो गया था। 

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

ऐसे असंख्य चेहरे और मुखोटे में हमारे बिच बैठे है………आप लाचार थे लाचार है…..कामंधता एक नाइलाज मनोरोग है………किसके अंदर कब सर उठा के …..आजाये ….पता नहीं…. आपने और अनिल जी ने सवाल भी उठाये हैं और जवाब भी देने की कोशिश की है...... विषय बहुत ही गंभीर है केवल चर्चा भर कर लेने से समाधान निकल जायेगा कहना मुश्किल है. बचपन में ही मैंने पढ़ा था - मातृवत पर दारेषु, परद्रव्येषु लोष्टवत.... आगे की पंक्ति अभी याद नहीं आ रही है. मतलब यही की हमारे अंतर्मन की सोच में बदलाव लाने की जरूरत है. पर कैसे? यक्ष प्रश्न यही है. चर्चा चली है तो शायद हल निकल जाय! आदरणीय श्री शशि जी ने भी अपने लेख में यह सवाल उठाया था पर उस परिचर्चा में बहुत कम महिलाओं ने हिस्सा लिया था... उम्मीद है यहाँ अधिकतर महिलाएं हिस्सा लेंगी और कुछ ठोस विचार सामने आएंगे.....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

हे विद्वानों ..... मैं भी प्रिय आनंद परवीन जी की बात का पुरजोर समर्थन करता हूँ ..... दूसरे पहरे में लयबद्धता की कमी साफ़ साफ़ दिखलाई पड़ती है आखिरकार एक लेख और कविता में कुछ तो फर्क होता है बाकि किसी नए रचनाकार का उत्साह बढाने के लिए झूठ बोलना + झूठी तारीफ करना मैं बुरा नहीं समझता कुछ न कुछ तो छूट इन्हें देनी ही होगी उदारता के साथ हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE




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